ऐसा धार्मिक स्थल जहां मन्नत पूरी होने पर ग्रामीण चढ़ाते हैं मिट्टी के घोड़े: जंगलों में स्थित हाकड़ी पाठ मंदिर बना श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रतीक



नेमन साहू रिपोर्टर, डौण्डी लोहारा। डौण्डी लोहारा क्षेत्र के घने जंगलों के बीच वर्षों से आस्था का केंद्र बना हाकड़ी पाठ मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के विश्वास और परंपरा का जीवंत उदाहरण बना हुआ है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे इस मंदिर की ख्याति केवल आसपास के गांवों तक सीमित नहीं, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों तक फैली हुई है।

डौण्डी लोहारा विकासखंड के ग्राम रेंगाडबरी से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को घने जंगलों और कच्चे रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं देखी जाती और प्रतिदिन बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

स्थानीय जनमान्यताओं के अनुसार यहां विराजमान बाबा गैंद सिंह की कृपा से भक्तों की मन्नतें पूर्ण होती हैं। मंदिर के पुजारी मोहरन रावटे द्वारा वर्षों से परंपरागत रूप से पूजा-अर्चना की जा रही है। बताया जाता है कि जब श्रद्धालुओं की मन्नत पूरी होती है, तो वे मंदिर में नारियल, अगरबत्ती और पारंपरिक रूप से मिट्टी का घोड़ा चढ़ाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।

इस मंदिर की विशेष पहचान यह भी है कि यहां देवी-देवताओं की अनेक मूर्तियां स्थापित हैं, जहां श्रद्धालु परिवार सहित पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। खासकर त्योहारों, अमावस्या और विशेष धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और पूरा जंगल क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूब जाता है।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि हाकड़ी पाठ मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और लोक विश्वास को भी संजोए हुए है। आने वाले समय में मंदिर तक पहुंच मार्ग और सुविधाओं के विकास की मांग भी ग्रामीणों द्वारा की जा रही है, ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा मिल सके।

बताया जाता है कि कई वर्षों से महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर प्रांगण में भव्य मंडाई मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें आसपास के देवी-देवताओं का महासंगम और देवसमागम होता है। इस दौरान क्षेत्र भर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण शामिल होकर धार्मिक उत्सव में भाग लेते हैं।

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