कविता: अब क्या बताना बाकी रह गया



सब तो कह दिया इन आंखों ने,
सब तो बह गया इन अश्कों में।
जो अनकहा था वह हवाओं में घुल गया,
जो अनसुना था वह खामोशी में मिल गया।

तो अब क्या बताना बाकी रह गया?

तारीख है गवाह मेरी वफाओं की,
दीवारें सबूत हैं मेरी दुआओं की।
वह जो कतरा उम्मीद बचा था,
वक्त की धूप में वह भी सूख गया।
अभी जब मंज़िलें ही रास्तों से खफा हैं,

तो अब क्या बताना रह गया?

पन्ने भी खत्म हुए, स्याही भी सूख चली,
बात जो शुरू हुई थी, वो अब रूठ चली।
शिकवे भी पुराने हुए और शिकायतें भी,
मोहब्बत भी थकी है और अदावतें भी।
जब ख़त ही नहीं पहुंच पते पर,

तो अब क्या बताना बाकी रह गया?

ज़रा सा मुस्कुरा कर पर्दा गिरा देते हैं,
चलो बची-खुची बातों को हवा में उड़ा देते हैं।
जो समझ गए उनके लिए इशारा ही काफी था,
जो ना समझे उनके लिए सारा आलम काफी था।
जब सफर ही मुकम्मल मोड़ पर आ खड़ा है,

तो क्या बताना बाकी रह गया?

✍️ स्वरचित कविता
मोना रावत (शिक्षिका)

You cannot copy content of this page