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वैलेंटाइन डे विशेष -प्यार की असली परिभाषा- एक ने पत्नी की याद में स्कूली बच्चों की डिजिटल पढ़ाई के लिए शुरू की मुहिम, तो दूसरे पति ने भी पत्नी की याद में स्कूल को दान की जमीन और खुद भी दुनिया से चल बसे

माधुरी दीपक यादव, बालोद /जगन्नाथपुर । आज 14 फरवरी वैलेंटाइन डे है।  हम आज पति पत्नी के बीच प्यार की असली परिभाषा की दो कहानी बता रहे हैं। जो आपको हमेशा प्रेरित करेगी, कि कैसे शादी के सात फेरे लेना ही काफी नहीं है, बल्कि दिल से साथ निभाना भी जरूरी होता है। पहली कहानी है एक शिक्षक दंपति की। जिसमें पति और पत्नी दोनों शिक्षक रहे। पर पत्नी नीलम देशमुख का अक्टूबर में निधन हो गया। जिसके बाद अपनी पत्नी की याद में उनके पति शिक्षक निलेश देशमुख क्षेत्र के ग्राम खपरी प्राइमरी स्कूल के बच्चों की पढ़ाई को डिजिटल बनाने के लिए प्रयास कर रहें हैं। दरअसल में उनकी पत्नी नीलम की पोस्टिंग उसी स्कूल में थी, मूल रूप से दुधली के रहने वाले देशमुख दंपति के बीच अनूठा प्यार रहा और इसीलिए पत्नी के इस दुनिया से जाने के बाद उनके सपने को पूरा करने के लिए लगातार उनका पति नीलेश देशमुख प्रयास कर रहें। प्रधान पाठक  रही नीलम चाहती थी उनके बच्चे डिजिटल पढ़ाई में भी अव्वल हो। सरकारी स्कूल में बहुत कम जगह पर यह सुविधा रहती है इसलिए वह खुद अपने वेतन से वहां पर ये सुविधा देनी चाहती थी।

प्रकृति को कुछ और मंजूर था और त्वचा संबंधी एक बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। पर इस दुनिया से जाने से पहले पत्नी ने पति से अपने सपने बताए थे कि वह क्या करना चाहती थी। जो काम अधूरे रह गए हैं उसे पूरे कर देना। पत्नी के सपनों को पूरा करने की दिशा में पति ने कदम बढ़ाया और उस स्कूल में कंप्यूटर सेट दिया। स्कूल के शिक्षकों का कहना है कि लगातार निलेश देशमुख का सहयोग हमें मिलता आया है।

वे खुद कहते हैं कि अगर कोई भी जरूरत हो तो हमें बताइए। जब उनकी पत्नी नीलम देशमुख प्राथमिक शाला खपरी में प्रधान पाठक  रही तो चंद महीने में ही उन्होंने अपने कार्यकाल में स्कूल के विकास को लेकर बहुत कुछ काम किया था। पर डिजिटल क्लास का सपना अधूरा था। जो उनके पति ने पूरा कर दिखाया। शाला प्रबंधन समिति के अध्यक्ष नेतराम कुंभकार सरपंच गोपाल देवांगन, प्रभारी प्रधान पाठक सुरेंद्र मंडलोई ने कहा कि आज भी बच्चे स्वर्गीय नीलम देशमुख को बहुत याद करते हैं। अब वह नहीं रहे लेकिन उनकी याद में उनके पति द्वारा दिया गया कंप्यूटर एक हमेशा यादगार रहेगा। वही उनके पति नीलेश देशमुख का कहना है कि बच्चों को आगे बढ़ाने का सपना उनकी पत्नी ने देखा था। जिसे वे पूरा कर रहे हैं। जब जैसी जरूरत पड़ी वह स्कूल के बच्चों को आगे भी मदद करेंगे। शुरुआत से ही पत्नी का स्वभाव खासतौर से गरीब बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने, भूखों को भोजन खिलाने और कोई भी चीज को वेस्ट न करने को लेकर था। वह घर में खाना भी बच  जाता था तो वह उसे नाली या डस्टबिन में ना फेंककर जानवरों को खिलाती थी। घर में कोई कपड़ा भी वेस्ट नहीं होता था। वह गरीबों को कपड़ा दान करती थी। सेवा और पुण्य का भाव पत्नी में कूट-कूट कर भरा हुआ था। और उनकी अच्छाइयों को आत्मसात करके मैं उनके सपनों को पूरा कर रहा हूं। 20 साल तक हम साथ रहे। इस दौरान मैंने अपनी पत्नी से बहुत कुछ सीखा।मेरी पढ़ाई पूरे गांव में हुई थी और उसकी पढ़ाई पूरी शहर में। जब वह शादी करके हमारे घर आई तो मुझे पहले झिझक थी कि मैं गांव में पढा हूं वह शहर से, कैसे समन्वय  बन पाएगा। लेकिन पत्नी ने सब संभाल लिया और त्याग व समर्पण की भावना से हमारा रिश्ता गहरा होता चला गया। लेकिन कुदरत को कुछ और मंजूर था और वह साथ छोड़ चली गई। पर उनकी यादें हमेशा साथ रहेगी और वे जरूरतमंद बच्चों की इसी तरह मदद करते रहेंगे।

पत्नी की याद में दान की 4 एकड़ जमीन अब खुद भी दुनिया से चल बसे 

इसी तरह पति पत्नी के इस तरह के अनूठे प्यार की दूसरी कहानी है ग्राम रौना की। जहां रहने वाले पांडेय दंपत्ति के कार्यों को लोग आज भी याद करते हैं। यहां का स्कूल उनकी दानशीलता का प्रमाण है। 4 साल पहले पंडित छबिलाल पांडेय की पत्नी का निधन हुआ। उनकी याद में निसंतान छविलाल पांडे ने अपनी 4 एकड़ की जमीन को रौना के प्राइमरी और मिडिल स्कूल को दान कर दी। पत्नी विमला बाई का 4 साल पूर्व निधन हो गया था। उसके बाद गांव वाले ही उनकी सेवा कर रहे थे। दान की गई जमीन की कीमत लाखों में थी। पर पत्नी के प्यार के सामने यह सब कुछ नहीं था। इसलिए उन्हें कोई मोह, लोभ नहीं था। पर विगत दिसंबर 2020 में छबिलाल पांडे का भी 83 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। पर उनकी यादें  स्कूल और वहां की दान में मिली हुई जमीन से जुड़ी हुई है। प्रधान पाठक प्रवीण लोणहारे  ने कहा कि संतान ना होने के बाद भी स्वर्गीय छविलाल पांडे और उनकी पत्नी विमला बाई की जोड़ी पूरे गांव में एक मिसाल थी। और पत्नी के जाने के बाद उनकी याद में लाखों की जमीन दान कर छविलाल पांडे एक खास शख्स भी बन गए थे। जिन की सराहना मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तक ने की थी  अब स्कूल प्रबंधन सहित ग्रामीण भी इस दंपत्ति की याद में स्कूल के नाम को स्वर्गीय दानवीर छविलाल पांडे के नाम से करने की मांग भी कर रहे हैं।

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