DAILY BALOD NEWS

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आखिर ऐसा क्या है बालोद के जंगलों में कि चंदा हाथियों का दल महाराष्ट्र से भी हो गई वापस?

हाथियों को हुआ यहां के जंगल और पहाड़ों से प्यार

वन विभाग की सतर्कता बढ़ी, 24 घंटे चल रही निगरानी

बालोद। लगभग डेढ़ साल से बालोद जिले में हाथियों के दल का आना जाना लगा हुआ है। इस दौरान चार से पांच जाने हाथियों के आतंक से भी जा चुकी है । तो कई किसानों की फसलें भी तबाह हुई है। लेकिन जैसे-जैसे हाथियों की आमद का समय बीतता जा रहा है यहां के लोगों को भी समझ में आ रहा है कि अब उनसे कैसे बचना है। तो वही हाथियों के लिए भी यह क्षेत्र एक अनुकूल माहौल पैदा कर रहा है। और यही वजह है कि जहां के जंगल, पहाड़, नदी नाले सहित सभी स्रोत हाथियों को भाने लगे हैं। और वे बालोद और धमतरी जिले को छोड़कर जाने का नाम नहीं ले रहे हैं। अगर कभी घूमते टहलते दूसरे जिले तक पहुंच जाते हैं तो भी वहां से वापस हो जाते हैं। इतना ही नहीं पिछले कुछ माह पहले हाथियों का यह दल राजनांदगांव जिला होकर महाराष्ट्र में प्रवेश कर चुका था। महाराष्ट्र के वन अमले द्वारा इन हाथियों को उनके इलाके में रोककर वहां कॉरिडोर बनाने की प्लानिंग थी लेकिन उनका यह प्रयास असफल रहा। क्योंकि हाथियों का दल वहां ठहरा नही और वापस राजनांदगांव, कांकेर होते हुए हाथियों के दल ने धमतरी और अब बालोद में एंट्री कर ली है। गुरुर ब्लॉक के धानापुरी क्षेत्र में हाथियों का दल घूम रहा है। जंगल में विचरण कर रहा है। इन पर 24 घंटे विभाग की नजर बनी हुई। हालांकि इस बार शांत तरीके से हाथी आ रहे हैं और अपना भोजन ग्रहण कर रहे हैं। उनके लिए जहां पर्याप्त आहार है। अपनी भूख मिटा रहे हैं चैन से आराम कर रहें। अभी खेतों में फसल भी नहीं है सो फसल हानि की गुंजाइश भी कम है। किसानों को हमेशा की तरह विभाग ने सचेत किया है खेतों की ओर फिलहाल ना जाए और हाथियों को परेशान ना करें। उन्हें भगाने के लिए बाजा पटाखा ना बजाए। इससे हाथियों में भगदड़ मच जाती है और फिर वे हिंसक हो जाते हैं। हाथियों की लगातार बालोद जिले में आवाजाही को लेकर DailyBalodNews ने डीएफओ आयुष जैन से बातचीत की और यह जानने की कोशिश की गई कि आखिर क्या वजह है कि हाथी क्षेत्र में बार-बार आ रहे हैं। पढ़िए उनसे बातचीत के कुछ अंश,,,,,,,

सवाल– हाथियों की वापसी जिले में बार-बार हो रही है इसकी वजह क्या है? क्या यहां उन्हें अनुकूल माहौल मिल रहा है?

जवाब– हां, ऐसा तो हो ही रहा है इस इलाके में हाथियों के अनुकूल माहौल मिल रहे और यह हाथियों की प्रवृत्ति भी होती है कि जहां से एक बार विचरण कर चुके हैं अगर वहां स्थिति ठीक हो उनके खाने-पीने के स्रोत पर्याप्त हो तो वे उस इलाके में दोबारा लौट कर जरूर आते हैं। क्योंकि उनकी मेमोरी लॉन्ग टर्म होती है। उनकी याददाश्त कई सालों तक रहती है। और वे उसी रास्ते पर दोबारा आ भी जाते हैं। बालोद, धमतरी, कांकेर क्षेत्र में बार-बार आने की वजह भी यही है। वे एक जगह लंबे समय तक ठहर कर पूरे स्रोत को खत्म भी नहीं करते। कुछ दिन ठहरते हैं फिर दूसरी जगह चले आते हैं। फिर कुछ समय अंतराल पर वापस उन्हीं इलाकों में आ जाते हैं जहां उन्हें बेहतर लगा था।

सवाल– लगभग डेढ़-2 साल से बालोद जिले में हाथियों की आवाजाही से लोग दहशत में रहते हैं। कई जाने भी जा चुकी है। इसे रोकने क्या किया जा रहा है ।

जवाब– हम तो शुरुआत से ही लोगों को सचेत करते हैं कि हाथियों को परेशान ना करें। वन्य प्राणी है, उन्हें वनों में घूमने दे। पर लोग पटाखे फोड़कर या किसी तरह से शरारत कर उन्हें परेशान करते हैं। इस बार इस पर काफी सख्ती बरती जा रही है। पूरी टीम को गांव में लगा दिया गया है। जहां जहां हाथी घूम रहे हैं वहां ग्रामीणों पर भी नजर रखी जा रही है उन्हें आसपास फटकने नहीं दिया जा रहा है। ताकि हाथी शांति से घूमे और जब तक रहना चाह रहे और फिर चले जाएं। उन्हें हम भगाना नहीं चाहते, ऐसा कर भी नहीं सकते हैं।

सवाल– क्या बालोद जिले के जंगल हाथियों को भा रहे हैं। अगर ऐसा है तो यहां कॉरिडोर विकसित क्यों नहीं कर सकते?

जवाब– कॉरिडोर विकसित करना अलग ही लेवल का काम है ऐसा कर सकते हैं लेकिन शासन की प्लानिंग पर निर्भर है। बालोद जिले में यहां फिलहाल नहीं कर सकते। अभी इस इलाके की स्थिति कॉरिडोर के लायक निर्मित नहीं हो पाई है।

सवाल– निगरानी का तरीका क्या है? क्या कॉलर आईडी लगी है, जानकारी मिली है कि कॉलर आईडी जो बंद हुई थी वह आज तक चालू नहीं हो पाई है?

जवाब– हां,। चंदा हाथी में कॉलर आईडी लगाया गया था जो कि बंद हो चुकी है। उसके बाद अन्य हाथी में आईडी नहीं लग पाई है। यह वाइल्ड लाइफ की टीम का काम है। हमने इसकी जानकारी दे दी है। अभी उनके ऊपर निगरानी के लिए परंपरागत तरीको से निर्भर है। दूर से हाथियों के दल की निगरानी की जा रही है। उनके नजदीक जाने व उनसे छेड़खानी करने से आसपास के गांव के लोगों को मना भी कर रहें हैं और उन्हें वहां से दूर रखा जा रहा है।

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