शीर्षक – होली, रचयिता : धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्रीझलमला बालोद
होली के दिन सुग्घर बोली, उड़ही रंग गुलाल।प्रेम रंग मा बुड़ही लोगन, होही माला माल।। अंतस बजही ढोल नगाड़ा, उमड़त आज उमंग।धरम-करम रद्दा मा चलही, भिजही जम्मो अंग।। दया दृष्टि…
