अब ये क्या मुसीबत है, डेढ़ घंटे ही काम कर है रसोइए, पढ़ाई छोड़ खाना बनाने का जिम्मा संभाल रहे शिक्षक और समूह वाले
सरकार के अजीबोगरीब आदेश से मचा स्कूलों में हलचल, शिक्षक, प्रधान पाठक, संचालक समूह में नाराजगी, रसोइए हड़ताल की चेतावनी देकर कर रहे मनमानी
बालोद( छत्तीसगढ़)। आपने डेढ़ होशियारी,,,, यह शब्द तो सुना होगा। जीवन में कभी ना कभी इसका हर किसी के साथ सामना जरूर हुआ है। पर आज शिक्षा विभाग में यह शब्द चर्चा में है। क्योंकि डेढ़ होशियारी में जारी हुआ डेढ़ घंटे से संबंधित आदेश रसोइयों को तो दूर शिक्षकों पर भारी पड़ गया है। सरकार ने रसोइयों को कहा है कि वह स्कूल में डेढ़ घंटे ही काम करेंगे। सरकार उनका मानदेय न बढ़ाते हुए काम के घंटे में कटौती कर यह पैंतरा अपना रही है तो दूसरी ओर रसोईया भी डेढ़ होशियारी दिखाते हुए काम को अधूरा छोड़ कर स्कूल से घर जाने लगे हैं। ऐसे में बचा हुआ काम यानी भोजन बनाने का अधूरा काम शिक्षकों के माथे आ पड़ा है। बालोद जिले ही नहीं पूरे छत्तीसगढ़ में यह समस्या खड़ी हो गई है और जो शिक्षक बच्चों का भविष्य बनाने के लिए उन्हें क्लास में पढ़ाते नजर आते थे, वह इन दिनों स्कूलों में किचन संभाल रहे हैं। वहां आलू, टमाटर काट रहे हैं, सब्जी भून रहे हैं, दाल चावल पका रहे हैं। अब जरा विस्तार से समझिये पूरा मामला,,,,,
इन दिनों सरकारी स्कूलों में शिक्षक बच्चों को पढ़ाना छोड़ कर खाना बनाने में व्यस्त हो गए हैं। क्योंकि उनके लिए मुसीबत ही ऐसी आ पड़ी है कि रसोइए मात्र डेढ़ घंटे ही काम कर रहे हैं और जो काम बचा है उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर आन पड़ी है। शासन ने रसोइयों को हो रही परेशानी को देखते हुए उन्हें डेढ़ घंटे तक काम करने का आदेश जारी किया है। जिसको लेकर सभी शिक्षा अधिकारियों ने स्थानीय स्कूलों को आदेश प्रसारित कर दिया है। तो रसोइए आदेश के पालन में डेढ़ घंटे ही स्कूल आकर जितना काम हो सके उसे निपटा कर वापस चले जा रहे हैं। इसके बाद जो भी काम बचा है उसे पूरा करने की जिम्मेदारी या तो संस्था प्रमुखों पर आ गई है या फिर मध्यान भोजन चला रहे स्व सहायता समूह पर। ऐसे में जहां समूह वाले खाना पकाने से इंकार कर रहे तो जिम्मेदारी शिक्षकों पर आ गई है। बालोद के कन्नेवाड़ा, लिमोरा सहित कई स्कूल ऐसे भी हैं जहां पर स्वयं शिक्षक ही खाना पका रहे हैं। ऐसा नजारा सोमवार को देखने को मिला। दरअसल में बालोद बीईओ द्वारा भी डीईओ के आदेश के बाद अलग से आदेश जारी किया गया है। जिसमें कहा गया है कि रसोईया डेढ़ घंटे काम करेंगे उसके बाद जिम्मेदारी संस्था प्रमुख व समूह की होगी। कई जगह समूह वाले भोजन बनाने से इंकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि हमारा काम मध्यान भोजन के लिए सामग्री उपलब्ध कराना है। उसके बाद खाना बनाने का काम रसोइयों का है। रसोइए पहले से शासन प्रशासन को अल्टीमेटम दे रखे हैं कि 12 जुलाई तक स्कूल खोलने पर पहुंचेंगे और डेढ़ घंटे तक रहेंगे। शासन ने आदेश में स्पष्ट नहीं किया है कि कितने से कितने बजे तक डेढ़ घंटे के अंतराल काम करना है। 12 जुलाई के बाद रसोइयों ने हड़ताल की चेतावनी दी है। तो वही 12 जुलाई से पहले ही शिक्षकों पर परेशानियों का पहाड़ टूट पड़ा है। शिक्षकों में इस बात से नाराजगी बढ़ रही है। शिक्षकों का कहना है कि हम खाना बनाएं या बच्चों को पढ़ाएं। ऊपर से शिक्षकों पर मध्यान भोजन की गुणवत्ता की जिम्मेदारी भी डाली जाती है। इधर महिला स्व सहायता समूह जो राशि मिल रही उससे असंतुष्ट पहले से ही हैं। अब रसोइयों का भार नहीं उठाना चाहते और खाना बनाने से हाथ खड़े कर रहे। ऐसे समूहों से शिक्षा विभाग के अधिकारी भी लिखित में ले रहे हैं ताकि उनकी जगह दूसरे समूह को काम दे सके।
क्या है आदेश में
बालोद डीईओ प्रवास बघेल सहित सभी बीईओ द्वारा आदेश जारी किए गए हैं। जिसमें शासन के आदेश का ही संदर्भ है। रसोइयों को होने वाली विभिन्न परेशानी जैसे आकस्मिक व अन्य कारणों से स्कूल नहीं जा पाते, ऐसी स्थिति में खाना बनाने की जिम्मेदारी किस पर हो, इसको लेकर विशेष आदेश शासन से जारी हुआ है। जिसमें कहा गया कि रसोई अब डेढ़ घंटे ही काम करेंगे। दरअसल में पूरा मामला निर्धारित मानदेय 1500 को बढ़ाने को लेकर है। रसोईए अप्रत्यक्ष रूप से सरकार पर दबाव बना रहे हैं और मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे। सरकार मानदेय ना बढ़ाकर उनके काम के घंटों में कटौती कर रही। सरकार का मानना है कि डेढ़ घंटे में खाना बनाने का काम हो सकता है। पर रसोईए टालमटोल कर रहे हैं और डेढ़ घंटे को अपर्याप्त बताते हुए जितना हो सकता है वहीं तक काम करके स्कूल से घर चले जा रहे हैं। कहीं चावल पकी है तो सब्जी नहीं, कहीं सब्जी पका है तो दाल नहीं गली। ऐसी मुसीबतों के बीच आगे का जिम्मा शिक्षकों और स्व सहायता समूह को संभालना पड़ा है। अब देखने वाली बात होगी ये मुसीबत कब तक रहती है। अधिकारी भी खुद ऐसी स्थिति में व्यवस्था संभालते परेशान हो गए हैं।
जरा इधर भी समझें,,,,क्या कहते हैं डीईओ और बीईओ
बालोद के डीईओ प्रवास बघेल का कहना है कि हमने आदेश जारी किया है कि अगर रसोईया डेढ़ घंटे बाद काम छोड़कर जा रहे हैं तो आगे की जिम्मेदारी योजना का संचालन कर रहे स्व सहायता समूह की है। रसोइयों की इस तरह बीच में काम छोड़कर जाने से भोजन बनाने में परेशानी हो रही है। स्कूलों से शिकायतें आ रही है। इस पर कोई रास्ता निकालने के लिए प्रयास करते हैं। डेढ़ घंटे का आदेश शासन से ही है। जिसके संदर्भ में हमने सभी बीईओ को आदेश जारी किया है। इधर बालोद बीईओ बसंत बाघ का कहना है कि व्यवस्था बनाने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार के आदेशों का ही हम पालन कर रहे हैं। उच्च अधिकारियों से जो निर्देश प्राप्त होता है उस हिसाब से आगे की कार्रवाई करेंगे। कुछ जगह शिक्षक स्वयं खाना बना रहे हैं यह बात भी सही है। तो कुछ जगह समूह वाले खाना बनाने से मना भी कर रहे। झलमला में ऐसी शिकायत आई है। ऐसे मामलों की जांच भी की जा रही है, उचित कार्रवाई की जाएगी। बीईओ ने कहा रसोइयों की नियुक्ति समूह की सहमति से की जाती है इसलिए अगर रसोईए डेढ़ घंटे के बाद जा रहे हैं तो आगे के काम की जिम्मेदारी समूह की होती है। उन्हें भोजन बनवा कर बच्चों तक परोसना ही पड़ेगा।
संस्था प्रमुखों के साथ समूह को दी गई जिम्मेदारी, शिक्षकों को समूह से काम करवाना है खुद नही बनाना है,,
बालोद ब्लॉक के मध्यान्ह भोजन योजना की प्रभारी रजनी वैष्णव का कहना है कि शासन से डेढ़ घंटे को लेकर आदेश प्राप्त हुआ है। जिसको लेकर उच्चाधिकारियों के निर्देश के बाद सभी स्कूलों को आदेश भेजा गया है। जिसमें रसोइयों द्वारा डेढ़ घंटे तक काम के बाद जो काम शेष रहता है उसे पूरा करने की जिम्मेदारी संस्था प्रमुखों के साथ समूह को दी गई है। वह इसलिए दी गई है क्योंकि अगर कोई अधिकारी निरीक्षण में जाते हैं और वहां भोजन पका नहीं मिलता है तो फिर संस्था प्रमुख यह ना कहे कि हमें तो कोई आदेश नहीं है। बच्चों को भोजन मिलना चाहिए यह उनका अधिकार है। इसलिए संस्था प्रमुखों को भी इसकी जवाबदारी दी गई है कि वे समूह के जरिए भोजन पकवाए। कुछ जगह खुद शिक्षक भोजन पका रहे हैं यह गलत है। उन्हें समूह वालों को इसके लिए निर्देशित कर उनसे काम करवाना चाहिए।
ये भी पढ़ें
