DAILY BALOD NEWS

EDITOR IN CHIEF – DEEPAK YADAV.9755235270

Advertisement

आख़िर क्या वजह है कि इस परिवार में लोगों के नाम रखे जाते हैं कलेक्टर, जज, पुलिस सिंह, पढ़िए कोंडागांव की ये रोचक कहानी

कोंडागांव – इन दिनों एक गांव का एक परिवार अपने अजीबोगरीब नामों की वजह से छग में चर्चा में आया है, दरअसल में इस परिवार में नाम नहीं बल्कि पदनाम को ही नाम रखा जाता है जैसे कलेक्टर, पुलिस, वकील , ये सब एक ही परिवार के सदस्यों के नाम हैं। पिता का नाम सूबेदार सिंह। उसके पांच बेटे हैं। पांचों बेटों का नाम है कलेक्टर सिंह, पुलिस सिंह, दरोगा सिंह, वकील सिंह और जज सिंह। परिवार के सभी सदस्य बिजली मैकेनिक हैं। ये परिवार कोंडागांव से दो किलोमीटर दूर कुम्हारपारा में रहता है। इस तरह के नाम रखे जाने के पीछे भी एक अजीब कारण है बताया जाता है कि उक्त परिवार मूलत: बिहार के हैं, लेकिन पिछले 25 सालों से यहीं रहते हैं। सूबेदार के पुत्र कलेक्टर सिंह ने बताया कि घर में कोई भी बच्चा जीवित नहीं बचता था। नामकरण के बाद उसकी मौत हो जाती थी। पिता सूबेदार ने फिर बच्चों का नामकरण कराना बंद कर दिया। उसके अपने पूर्वजों से सुना था कि अजीबोगरीब नाम रखने से बच्चे बच जाते हैं। लोग इसे कुछ भी कहें, उसने अपने बच्चों के नाम प्रशासनिक पदों के हिसाब से रख दिए। अब इस गांव के किसी भी बड़े अादमी के घर बिजली का कोई काम होता है, तो वे सीधे कहते हैं, जाओ कलेक्टर या पुलिस को बुला लाओ।

गांवों में आज भी जीवित है ये अजीब परंपरा

दरअसल आज भी यह परंपरा गांवों में जीवित है। मान्यता है कि जब परिवार मेें किसी भी वजह से लगातार बच्चों की मौतें होती हैं तो बच्चे को एक घर से दूसरे घर में बेचा जाता है या उन बच्चों का नाम ऐसा रखा जाता है जो बोलने सुनने में अजीब हो। इसके अलावा बेचने की परंपरा केवल दिखावा या डेमो की तरह होती है। मान्यता यह भी है कि ऐसा करने से बच्चों की उम्र लम्बी हो जाती है।

मामले में क्या बोले डॉ. दिनेश मिश्र, अध्यक्ष, अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति

ऐसा पहले होता था कि लोग झाड़ूराम, कचराबाई और इस तरह के नाम रखते थे ताकि उम्र बढ़ जाए। इसका लॉजिक ये होता था कि नज़र लगने से मौत हो जाती है। लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, पुराने जमाने में चिकित्सा की उतनी सुविधा नहीं थी। बच्चों की मृत्यु दर ज्यादा थी। प्रसव वाली महिलाओं की मृत्युदर ज्यादा थी। डिलीवरी पहले घरों में भी हुआ करती थीं, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। छोटे-छोटे गांवों में भी अच्छे अस्पताल हैं। इसलिए इस धारणा को बदलना चाहिए कि कुछ भी नाम रखने से बच्चों की उम्र बढ़ जाती है। नाम रखना बेहद निजी मसला है। यदि माता पिता शौक से अपने बच्चों का नाम कुछ रखते हैं तो यह उनका व्यक्तिगत अधिकार है। किन्तु समाज में यदि कुछ गलत धारणा बन रही हो, तो उसे तोड़ा जाना चाहिए। 

You cannot copy content of this page