अफसर कह रहे शासन से ही आवंटन नहीं, मटेरियल का भुगतान भी नवंबर से लंबित
बालोद/गुरुर। इन दिनों महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना में मजदूरी की गारंटी नहीं मिल रही है। वह इसलिए क्योंकि शासन से मजदूरी भुगतान के लिए ही पैसा नहीं आ रहा है। इससे जहां पंचायत स्तर पर मनरेगा के काम प्रभावित हो रहे हैं तो वही काम कर चुके मजदूरों को भरे त्यौहार होली में भी मजदूरी के भटकना पड़ रहा है। उनके खाते में पैसा नहीं आ रहा है। वहीं दूसरी ओर सामग्री भुगतान न होने से सरपंच भी कर्जदार हो गये हैं। जगन्नाथपुर के सरपंच व सरपंच संघ के ब्लाक अध्यक्ष अरुण साहू ने बताया कई सरपंच सामग्री का पैसा न आने की स्थिति में संबंधित सामान के देनदारों को पैसा देने कर्ज तक ले रहे हैं। क्योंकि मनरेगा में निर्माण एजेंसी ग्राम पंचायत रहती है। कई काम में निर्माण पंचायत के जरिए होते हैं। पर सामग्री, मटेरियल की सप्लाई अलग-अलग जगह से करनी पड़ती है। मटेरियल का लाखो बकाया है। हर पंचायत में यही स्थिति है। पर शासन प्रशासन से पैसा नहीं मिलने से सरपंच परेशान हैं। सामग्री सप्लाई करने वाले उन्हें तकादा कर रहे हैं। भोथली के सरपंच केशु गंधर्व सहित अन्य सरपंचों ने बताया मनरेगा से काम करवाके सरपंच उल्टा कंगाल हो रहे हैं। मजदूरों का तो पैसा मिला ही नहीं हैं। मटेरियल के पैसे के लिए खुद हम महीनों से जनपद के चक्कर कांट रहे हैं। वहीं जिला पंचायत के अफसरों का यह कहना है कि ब्लॉक ही नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में यह स्थिति बन गई है कि अभी मनरेगा के तहत शासन से फंड ही नहीं आ रहा है। जिसके वजह से भुगतान लंबित है। बताया जाता है कि बालोद जिले में मजदूरी भुगतान 9 करोड़ लंबित है तो वहीं सामग्री का भुगतान 21 करोड़ तक लंबित है। मजदूरी भुगतान की यह समस्या लगभग डेढ़ माह से है। तो ही सामग्री भुगतान की समस्या विगत नवंबर से है। बिना पैसे होली त्यौहार उन मजदूरों का फीका है जो मनरेगा के तहत काम करके आज मजदूरी के लिए तरस रहे हैं। तो वही सामग्री सप्लाई करने वाले भी आर्थिक दिक्कत झेल रहे हैं। जो लाखों रुपए तक का सामग्री उक्त योजना में लगा चुके हैं। अब भुगतान के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
मजदूरों का यह कहना
ग्राम नवागांव के मजदूर दयालु राम, बनिहारिन बाई साहू, सूरजभान सहित अन्य मजदूरों ने कहा कि हम यह सोच कर मनरेगा के काम में जाते हैं कि इसमें मजदूरी भी अच्छी मिलती है। हाल ही में इसमें मजदूरी दर को 190 से 193 रुपए भी किया गया है। सीधे खाते में पैसा आता है। पर काम हो जाने के बाद पता चलता है कि मजदूरी में तो अभी कोई ठिकाना नहीं है। पता नहीं कब खाते में पैसा आएगा? ऐसी स्थिति में मजदूरों का मनरेगा से मोहभंग भी होने लगा है। मजदूरों का कहना है कि त्यौहार में उम्मीद थी कि मजदूरी मिल जाएगी पर बिना मजदूरी के ही त्यौहार मनाना पड़ेगा। शासन प्रशासन को रोजगार उपलब्ध कराने के साथ-साथ समय पर मजदूरी भुगतान की व्यवस्था भी की जानी चाहिए तभी मजदूर भी काम करने को इच्छुक होंगे। वरना ऐसी स्थिति में फिर मजदूरों को भी काम करने में दिक्कत होगी और वह दूसरे काम की ओर रुख करेंगे।
पलायन रोकने शुरू की गई है योजना
ग्रामीण क्षेत्र में ज्यादा मजदूरी और समय पर मजदूरी के आस में ही पलायन की नौबत आती है। शासन की यह योजना है कि गांव में पलायन रोका जाए इसीलिए रोजगार गारंटी योजना शुरू की गई है पर समय पर मजदूरी न मिलने के चलते यह योजना भी अब अपना वजूद खोती नजर आ रही है।
सामग्री सप्लाई करने वाले कह रहे हैं कर्ज लेकर मजदूरों का पैसा दे रहे
मनरेगा के तहत पंचायत स्तर पर अलग-अलग कार्यों के लिए सामग्री सप्लाई करने वाले एक ठेकेदार का कहना है कि मनरेगा में काम करके वे पछता रहे हैं। सरकार से पैसा ही नहीं आया है। बिल पेंडिंग है। दफ्तर जाते हैं तो अधिकारी यही कहते हैं कि शासन से पैसा नहीं आया हैं तो हम क्या करें। ऐसे में भला कैसे काम चलेगा। हम तो अपना पैसा लगा चुके होते हैं। सामग्री खरीद कर हम सप्लाई कर चुके होते हैं। पर सरकार से लेटलतीफी के चलते काम करने में बहुत दिक्कत हो जाती है।
जानिए क्या है नियम
मनरेगा से जुड़े अफसरों के मुताबिक रोजगार गारंटी योजना के तहत कुल 150 दिवस रोजगार एक मजदूर को मिलता है। जिसमें 100 दिवस का रोजगार केंद्र सरकार की ओर से रहता है। तो 50 दिवस का रोजगार राज्य सरकार की ओर से। इसी तरह मटेरियल यानी सामग्री भुगतान की परिस्थिति में 80% हिस्सा केंद्र सरकार का होता है और 20% हिस्सा राज्य सरकार का ऐसे में कह सकते हैं कि भुगतान में देरी को लेकर दोनों ही सरकारें जिम्मेदार हैं।
क्या कहते हैं अधिकारी
मनरेगा के जिला कार्यक्रम अधिकारी का कहना है कि शासन से ही आवंटन प्राप्त ना होने के चलते भुगतान लंबित हैं। मजदूरी भुगतान लगभग 9 करोड़ रुपए डेढ़ माह से लंबित है। तो वहीं सामग्री संबंधित भुगतान 21 करोड़ नवंबर से लंबित है। जिले में दोनों मिलाकर कुल 30 करोड़ बकाया है। यह समस्या पूरे छत्तीसगढ़ में है। शासन से फंड आने के बाद ही आगे भुगतान हो पाएगा।
