जातीय जनगणना में पृथक ‘आदिवासी धर्म कोड’ की मांग तेज, समाज से मूल पहचान दर्ज कराने की अपील
बालोद (डौंडीलोहारा)। देशभर में 1 अप्रैल से प्रारंभ हुई जातीय जनगणना के परिप्रेक्ष्य में आदिवासी सामाजिक युवा नेतृत्वकर्ता गरुड़ साय मांडवी ने आदिवासी समाज की अस्मिता और पहचान को लेकर महत्वपूर्ण बयान जारी किया है। उन्होंने समाज से अपनी मूल पहचान को निर्भीकता के साथ दर्ज कराने का आह्वान किया है।
जनगणना में पृथक धर्म कोड की मांग उठी तेज
गरुड़ साय मांडवी ने कहा कि जातीय जनगणना के दौरान आदिवासी समाज को अपनी पारंपरिक पहचान के साथ दर्ज होना चाहिए। उन्होंने पृथक “आदिवासी धर्म कोड” लागू करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए इसे समाज की पहचान और अस्तित्व से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया।
1871 से 1951 तक था ‘ट्राइबल रिलिजन’ का अलग कॉलम
उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि वर्ष 1871 से 1951 तक की जनगणना में आदिवासियों के लिए “ट्राइबल रिलिजन” का अलग कॉलम मौजूद था, जिसे 1961 के बाद समाप्त कर ‘अन्य’ श्रेणी में शामिल कर दिया गया। इससे आदिवासी समाज को अपनी वास्तविक पहचान दर्ज कराने में कठिनाई हो रही है।
प्रकृति-पूजक परंपरा है आदिवासी धर्म की आधारशिला
मांडवी ने कहा कि आदिवासी धर्म किसी लिखित ग्रंथ या साकार ईश्वर पर आधारित नहीं है, बल्कि जल, जंगल और जमीन जैसी प्रकृति की शक्तियों की पूजा पर आधारित है। यह परंपरा मुख्यधारा के धर्मों से भिन्न और स्वतंत्र है।
पहचान के संकट से जूझ रहा है आदिवासी समाज
उन्होंने कहा कि पृथक धर्म कोड नहीं होने के कारण आदिवासी समाज की जनसांख्यिकीय पहचान प्रभावित हो रही है। अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास को सुरक्षित रखने के लिए अब समाज को एकजुट होकर इस मुद्दे पर आगे आना होगा।
प्रस्ताव पारित होने के बावजूद समाधान नहीं
गरुड़ साय मांडवी ने कहा कि झारखंड विधानसभा जैसे मंचों से पृथक धर्म कोड के प्रस्ताव पारित होने के बावजूद इस दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं होना चिंता का विषय है।
“हम प्रकृति के उपासक हैं” — मांडवी
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि
“हम न हिंदू हैं, न मुस्लिम, न सिख और न ही ईसाई। हम प्रकृति के उपासक हैं। यदि आज हमने स्वयं को अपनी मूल पहचान के साथ सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नहीं कराया, तो आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व पर संकट गहरा जाएगा।”
समाज से जागरूकता बढ़ाने की अपील
मांडवी ने समाज के युवाओं और बुजुर्गों से अपील की कि जनगणना के दौरान धर्म के कॉलम में भ्रमित न हों और स्वयं को “आदिवासी/प्रकृति पूजक” के रूप में दर्ज कराएं। उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों के प्रति जागरूकता ही समाज की संवैधानिक और सामाजिक शक्ति को मजबूत बनाएगी। 🌿📊
