जंगल की खाई में बसी बस्ती तक पहुंचना भी चुनौती, बीमारी में 2 किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ता है मरीज; बांस के सामान बनाकर गुजर-बसर कर रहे ग्रामीण
बालोद। देश आजादी का 80वां वर्ष मना चुका है, लेकिन बालोद जिले के किनारगोंदी-नर्रा पंचायत की कुएंकोन्हा बस्ती में रहने वाले 13 जनजातीय परिवारों को आज भी अपनी मूलभूत समस्याओं से आजादी नहीं मिल पाई है। करीब 30 वर्ष पहले कांकेर जिले से प्रवास कर यहां आकर बसे इन परिवारों की जिंदगी आज भी जंगल, खाई, पगडंडी और सीमित संसाधनों के बीच गुजर रही है। बिजली और पानी जैसी सुविधाएं किसी हद तक पहुंची हैं, लेकिन पक्की सड़क, वन अधिकार पट्टा, रोजगार और सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ अब भी बड़ा सवाल बना हुआ है।

डेली बालोद न्यूज़ और दर्शन बालोद की टीम स्वतंत्रता दिवस के दिन इस बस्ती में पहुंची और ग्रामीणों से बातचीत कर उनकी जिंदगी की वास्तविक तस्वीर जानने का प्रयास किया। बस्ती तक पहुंचने के लिए रानी माई मंदिर मुल्ले से आगे खाई में उतरना पड़ा और जंगल के बीच पैदल पगडंडी पार कर टीम यहां पहुंची। मौके पर जो तस्वीर सामने आई, वह आजादी के इतने वर्षों बाद भी विकास की पहुंच से दूर ग्रामीण जीवन की कहानी बयां करती है।
खाई में उतरकर पहुंचना पड़ता है बस्ती तक

कुएंकोन्हा जंगल के बीच खाईनुमा इलाके में बसी हुई है। बस्ती तक पहुंचने के लिए आज भी कोई पक्की सड़क नहीं है। ग्रामीणों को कच्चे और दुर्गम रास्ते से पैदल आवाजाही करनी पड़ती है। बारिश के दिनों में रास्ता और भी कठिन हो जाता है।
ग्रामीणों के मुताबिक सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है जब कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है। एंबुलेंस बस्ती तक नहीं पहुंच पाती और मरीज को करीब दो किलोमीटर तक पैदल ले जाकर मुख्य मार्ग तक पहुंचाना पड़ता है। आपात स्थिति में यह दूरी मरीज और परिवार दोनों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है।
पूर्व कलेक्टर के प्रयास से पहुंची थी बिजली और पानी की सुविधा

ग्रामीण बताते हैं कि जब बालोद जिले के कलेक्टर राजेश सिंह राणा थे, तब उन्होंने इस दूरस्थ बस्ती की स्थिति पर ध्यान दिया था। उनके प्रयासों से यहां सोलर सिस्टम के माध्यम से बिजली और पानी की व्यवस्था की गई थी। बाद में बस्ती में स्थायी बिजली मीटर कनेक्शन भी लगाए गए और पानी की समस्या में भी काफी राहत मिली।
ग्रामीणों का कहना है कि इससे उनके जीवन में बदलाव आया, लेकिन अब सबसे बड़ी जरूरत सड़क की है। उनका कहना है कि बिजली और पानी के बाद यदि बस्ती तक पक्की सड़क पहुंच जाए तो स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और अन्य सुविधाओं तक पहुंच आसान हो सकती है।
ललिता बाई के हाथों में बांस, इसी हुनर से चलता है परिवार

टीम जब बस्ती में पहुंची तो ग्रामीण महिला ललिता बाई बांस से सामान बनाती हुई नजर आईं। उन्होंने बताया कि बस्ती में रहने वाले लगभग सभी परिवार बांस से सामान बनाकर बेचते हैं। इसी छोटी-मोटी आजीविका के सहारे वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक रोजगार के साधन सीमित होने के कारण जंगल से मिलने वाले संसाधन और पारंपरिक हुनर ही उनकी जिंदगी का सहारा हैं। बांस से सामान तैयार करना, उसे बाजार में बेचना और छोटी-मोटी खेती करना ही उनकी आय के प्रमुख साधन हैं।
खेती करना भी आसान नहीं, पारंपरिक तरीके से उगाते हैं अनाज

ग्रामीणों ने बताया कि वे वर्षों से बस्ती के आसपास की छोटी-छोटी जमीन पर खेती करते आ रहे हैं। यहां वे मुख्य रूप से अपने खाने के लिए अनाज उगाते हैं। लेकिन वन क्षेत्र में खेती को लेकर उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि खेती के लिए ट्रैक्टर जैसे साधनों का उपयोग किया जाता है तो वन विभाग द्वारा कार्रवाई की जाती है और वाहन जब्त कर लिया जाता है। इसके चलते वे पारंपरिक तरीके से ही सीमित जमीन पर खेती करने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगल में कुछ करने की कोशिश करने पर वन विभाग की कार्रवाई का डर बना रहता है। ऐसे में वे अपने सीमित संसाधनों में ही परिवार चलाने को मजबूर हैं।
30 साल से जमीन पर काबिज, फिर भी वन अधिकार पट्टे का इंतजार
कुएंकोन्हा के ग्रामीणों की सबसे बड़ी मांग वन अधिकार पट्टा है। उनका कहना है कि वे करीब तीन दशक से यहां रह रहे हैं और जिस जमीन पर बसे हैं, वहीं खेती कर अपना जीवन चला रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें वन अधिकार पट्टा नहीं मिल पाया है।
ग्रामीणों के अनुसार पट्टा नहीं होने के कारण उन्हें अपनी जमीन से संबंधित अधिकारों के साथ-साथ कई सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी परेशानी होती है। वे चाहते हैं कि प्रशासन उनकी वास्तविक स्थिति का स्थल निरीक्षण कर वन अधिकार कानून के तहत पात्रता की जांच करे और नियमानुसार प्रक्रिया आगे बढ़ाए।
चुनाव के समय पहुंचते हैं नेता, फिर बस्ती को भूल जाते हैं!
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता इस बस्ती तक पहुंचते हैं, समस्याएं सुनते हैं और समाधान का भरोसा दिलाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद फिर कोई झांकने नहीं आता। ग्रामीणों के मुताबिक वर्तमान जिला प्रशासन और वन विभाग की ओर से भी लंबे समय से बस्ती की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दे रही है।
उनका कहना है कि वे किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे, बल्कि सड़क, भूमि अधिकार, स्वास्थ्य सुविधा और सरकारी योजनाओं का उचित लाभ चाहते हैं।
आजादी का जश्न वहां तक कब पहुंचेगा, जहां सड़क आज भी नहीं पहुंची?
देश स्वतंत्रता के 80 वर्ष पूरे होने का जश्न मना चुका है। बड़े शहरों से लेकर गांवों तक आजादी का पर्व मनाया गया, लेकिन कुएंकोन्हा जैसे दूरस्थ इलाकों में रहने वाले परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
यहां के ग्रामीणों के लिए आजादी का अर्थ केवल स्वतंत्रता दिवस मनाना नहीं, बल्कि ऐसी जिंदगी जीना है जिसमें बीमार पड़ने पर एंबुलेंस उनके घर तक पहुंचे, बच्चे आसानी से स्कूल जा सकें, जिस जमीन पर पीढ़ियों से रह रहे हैं उसके अधिकार का समाधान हो और मेहनत-मजदूरी व पारंपरिक हुनर से सम्मानजनक आय हो।
डेली बालोद न्यूज़ और दर्शन बालोद की टीम द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर मौके से तैयार किए गए वीडियो फुटेज में कुएंकोन्हा की वास्तविक तस्वीर और ग्रामीणों की समस्याओं को देखा जा सकता है। अब सवाल जिला प्रशासन और वन विभाग से है कि क्या इस बस्ती की आवाज सिर्फ एक खबर बनकर रह जाएगी या वास्तव में यहां सड़क, वन अधिकार पट्टा और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए ठोस पहल भी होगी?






