बालोद/डौंडीलोहारा। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा ब्लॉक अंतर्गत आने वाला ग्राम जाटादाह इन दिनों अपनी अनोखी होली परंपरा को लेकर चर्चा और कौतूहल का विषय बना हुआ है। यहां होलिका दहन के बाद ग्रामीण धधकते अंगारों पर नंगे पांव चलते हैं, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अब तक किसी भी ग्रामीण के पांव जलने या किसी बड़े हादसे की खबर सामने नहीं आई है।
यह परंपरा वर्षों से नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही है। ग्रामीण इसे होलिका माता और भक्त प्रहलाद के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक मानते हैं।
🌺 आस्था से जुड़ी परंपरा
होली के अवसर पर पूरे देश में जहां रंग-गुलाल की धूम रहती है, वहीं जाटादाह में होली की शुरुआत एक अनोखे और रोमांचक दृश्य से होती है। बुधवार को सुबह लगभग 5:00 बजे विधि-विधान के साथ होलिका दहन किया गया। ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की और होलिका माता से सुख-समृद्धि की कामना की।
होलिका दहन के बाद जब लकड़ियां पूरी तरह जलकर अंगारों में बदल जाती हैं, तब सुबह 7:00 से 8:00 बजे के बीच ग्रामीण एक-एक कर उन धधकते कोयलों पर नंगे पांव चलते हैं।
🔥 धधकते अंगारों पर नंगे पांव
दृश्य बेहद रोमांचकारी और आश्चर्यजनक होता है। जहां सामान्य व्यक्ति आग के पास जाने से भी डरता है, वहीं जाटादाह के ग्रामीण पूरे आत्मविश्वास और श्रद्धा के साथ अंगारों पर चलते नजर आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह सब उनकी आस्था और विश्वास का परिणाम है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। हर वर्ष होलिका दहन के बाद इसी प्रकार अग्नि-परीक्षा जैसी यह रस्म निभाई जाती है। उनका मानना है कि सच्ची श्रद्धा रखने वालों को होलिका माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है और कोई नुकसान नहीं होता।
🙏 पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, अब तक इस परंपरा के दौरान किसी प्रकार की बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है। कई बुजुर्गों का दावा है कि उन्होंने बचपन से लेकर आज तक इस दृश्य को देखा है और स्वयं भी अंगारों पर चले हैं।
यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की सामाजिक एकता और सामूहिक आस्था का प्रतीक भी बन चुकी है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस आयोजन में शामिल होते हैं। हालांकि अंगारों पर चलने की रस्म केवल कुछ निर्धारित ग्रामीण ही निभाते हैं, महिलाओं का चलना मना है।
👀 दूर-दूर से उमड़ती है भीड़
जाटादाह की यह अनोखी होली अब केवल गांव तक सीमित नहीं रही। डौंडीलोहारा ब्लॉक सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग इस दृश्य को देखने के लिए पहुंचते हैं। कई लोग इसे आस्था का चमत्कार मानते हैं तो कुछ इसे परंपरा और मानसिक दृढ़ता का उदाहरण बताते हैं।
हर वर्ष होलिका दहन के दिन गांव में मेले जैसा माहौल बन जाता है। सुबह-सुबह लोग अंगारों पर चलते ग्रामीणों का दृश्य देखने के लिए एकत्रित हो जाते हैं। कई लोग इस अद्भुत परंपरा को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आते हैं।
🤔 आस्था या विज्ञान?
जाटादाह की यह परंपरा वर्षों से कौतूहल का विषय बनी हुई है। जहां ग्रामीण इसे होलिका माता और भक्त प्रहलाद की कथा से जोड़कर देखते हैं, वहीं कुछ लोग इसे मानसिक विश्वास और विशेष तकनीक से जोड़कर भी समझते हैं।
हालांकि ग्रामीणों के लिए यह किसी बहस का विषय नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक भावना और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। उनका कहना है कि यह उनकी आस्था है, जिसे वे सम्मानपूर्वक और सावधानी के साथ निभाते हैं।
🌼 सामाजिक एकता का संदेश
इस आयोजन का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि पूरा गांव एक साथ मिलकर इस परंपरा को निभाता है। होलिका दहन से पहले सामूहिक पूजा, फाग गायन और प्रसाद वितरण किया जाता है। इससे गांव में भाईचारे और एकजुटता की भावना मजबूत होती है।
जाटादाह की यह अनोखी होली न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाती है कि ग्रामीण समाज आज भी अपनी परंपराओं और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी होलिका दहन और अंगारों पर चलने की यह परंपरा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई। जाटादाह की यह परंपरा आज भी लोगों के लिए आश्चर्य और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है — जहां आस्था, साहस और परंपरा एक साथ नजर आते हैं।
