प्रशासनिक सुधार बना विवाद का कारण? शिक्षक संगठनों ने उठाए गंभीर सवाल, न्यायिक जांच की मांग तेज
रायपुर/बालोद। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2024-25 के दौरान लागू की गई शिक्षक युक्तिकरण प्रक्रिया एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। शासन ने इसे स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात सुधारने और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की पहल बताया था, लेकिन प्रभावित शिक्षकों और शिक्षक संगठनों का आरोप है कि यह प्रक्रिया प्रशासनिक सुधार के बजाय सैकड़ों शिक्षकों के लिए परेशानी और प्रताड़ना का कारण बन गई है।
एक वर्ष बाद भी 200 से अधिक शिक्षक कार्यभार से वंचित
शिक्षक संगठनों के अनुसार युक्तिकरण लागू हुए लगभग एक वर्ष बीत चुका है, लेकिन आज भी 200 से अधिक शिक्षक नियमित रूप से कार्यभार ग्रहण नहीं कर पाए हैं। कई शिक्षक ऐसी स्थिति में फंसे हुए हैं जहां वे न तो पुराने स्कूल में कार्य कर पा रहे हैं और न ही नए पदस्थापना स्थल पर पूरी तरह से ज्वाइन कर सके हैं।
वरिष्ठता नियमों के उल्लंघन का आरोप
प्रभावित शिक्षकों का कहना है कि युक्तिकरण के दौरान वरिष्ठता सिद्धांत की अनदेखी की गई। कई स्थानों पर वरिष्ठ शिक्षकों को अतिशेष घोषित कर दूरस्थ क्षेत्रों में भेज दिया गया, जबकि कनिष्ठ शिक्षक यथावत बने रहे। इससे वर्षों की सेवा और अर्जित वरिष्ठता प्रभावित हुई है।
रिक्त पदों की जानकारी छिपाने के आरोप
शिक्षक संगठनों का दावा है कि कई रिक्त पद पोर्टल पर प्रदर्शित ही नहीं किए गए। अनेक शिक्षकों के निवास या वर्तमान कार्यस्थल के आसपास रिक्तियां होने के बावजूद उन्हें विकल्प के रूप में नहीं दिखाया गया। परिणामस्वरूप शिक्षकों को सैकड़ों किलोमीटर दूर पदस्थापना स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
संवर्गीय और विभागीय नियमों पर भी सवाल
आरोप है कि स्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षकों को आदिम जाति एवं अनुसूचित जनजाति विकास विभाग के स्कूलों में तथा वहां के शिक्षकों को स्कूल शिक्षा विभाग में भेजा गया। इसके अलावा बस्तर और सरगुजा जैसे संभागों में रिक्तियां होने के बावजूद शिक्षकों को अन्य संभागों में भेजे जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
प्रभावशाली लोगों को राहत मिलने के आरोप
शिक्षक संगठनों का कहना है कि युक्तिकरण के बाद कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के आदेश निरस्त कर उन्हें पुनः पुराने विद्यालयों में पदस्थ कर दिया गया, जबकि अन्य प्रभावित शिक्षकों को राहत नहीं मिली। इससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
वेतन रुका, परिवार आर्थिक संकट में
लंबे समय से कार्यभार और पदस्थापना को लेकर बनी अनिश्चितता का असर शिक्षकों के परिवारों पर भी पड़ा है। कई शिक्षकों को बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्ग माता-पिता के इलाज और दैनिक खर्चों के लिए कर्ज तक लेना पड़ा है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि मानवीय संकट भी बन चुका है।
उच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद समाधान नहीं
शिक्षकों का आरोप है कि न्यायालय द्वारा यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए जाने के बाद भी विभागीय स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए, जिससे प्रभावित शिक्षक लगातार असमंजस की स्थिति में हैं।
न्यायिक जांच और जवाबदेही की मांग
शिक्षक संगठनों ने मांग की है कि पूरी युक्तिकरण प्रक्रिया की जांच उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से कराई जाए। साथ ही वरिष्ठता नियमों के उल्लंघन, रिक्त पदों की जानकारी छिपाने, संवर्गीय नियमों की अनदेखी तथा कथित भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच कर दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
बड़ा सवाल
शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई युक्तिकरण प्रक्रिया यदि एक वर्ष बाद भी सैकड़ों शिक्षकों को कार्यभार, वेतन और न्याय से वंचित रखे हुए है, तो यह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं बल्कि व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है। अब देखना होगा कि शासन इस लंबे समय से लंबित विवाद का समाधान कब और किस रूप में निकालता है।
