पर्रेगुड़ा में भोला दशहरा एवं नवाखाई महोत्सव आज



बालोद-छत्तीसगढ़ के भोलापठार ग्राम पर्रेगुड़ा में भोला दशहरा एवं नवाखाई महोत्सव 28 सितम्बर दिन रविवार को रखा गया है। जिसमें कार्यक्रम सुबह 08 बजे से ग्राम देव् पूजा, सुबह 10 बजे से सभी देवों का भोलापठार में पदार्पण एवं 11 बजे सुरता के डोरी रिकॉर्डिंग डांस निपानी की प्रस्तुति होगी । अतिथि आगमन दोपहर 2:30 बजे से, विशिष्ट अतिथि संगीता सिन्हा विधायक, तारनी चंद्राकर अध्यक्ष जिला पंचायत बालोद, तोमन साहू उपाध्यक्ष जिला पंचायत बालोद, सरस्वती टेमरिया अध्यक्ष जनपद पंचायत बालोद, सुनीता संजय साहू अध्यक्ष जनपद पंचायत गुरुर, दिनेश सिन्हा उपाध्यक्ष जनपद पंचायत बालोद, लोकेश डडसेना सदस्य जनपद पंचायत बालोद, कमलेश श्रीवास्तव विधायक प्रतिनिधि बालोद, अमृता नेताम जनपद सदस्य बालोद, टेमन लाल साहू सभापति जनपद पंचायत बालोद, मालती बीरबल भूसाखरे सरपंच ग्राम पंचायत पर्रेगुड़ा होंगे। पूजा पाठ हवन कार्यक्रम 04 बजे से प्रारम्भ होगा। मंदिर प्रसादी राजकुमार चौरसिया शिक्षक कन्नेवाड़ा द्वारा दिया जाएगा। यह कार्यक्रम समस्त ग्रामवासी द्वारा हर वर्ष मनाया जाता है। ज्ञात हो कि भोलापठार में घने जंगल पहाड़ो के बीच में भगवान भोलेनाथ विराजमान है। यहां हजारो श्रद्धालू दर्शन करने आते है ,यह मंदिर जिला मुख्यालय से महज 15 कि. मी. की दूरी पर स्थित पर्रेगुडा (करहीभदर ) में है। जिसमें भोलापठार समिति के अध्यक्ष राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित रामजी ठाकुर, प्रबंधक रामलाल देहारी, कुम्भकरण भूसाखरे, संरक्षक पी के देशमुख, उपाध्यक्ष जोहन प्रधान ,रामहु राणा, कोषाध्यक्ष महेंद्र तारम, सचिव पुरुषोत्तम निषाद, सहसचिव भुवन लाल उइके एवं मंच संचालक परमानन्द गुरुपंच करेंगे। रात्रि कालीन मनोरंजन के लिये झन भूलो माँ बाप ल छ. गढ़ी नाचपार्टी मड़ई भाठा (मोखा )की प्रस्तुति होगी। यह कार्यक्रम भोला पठार समिति एवं समस्त ग्रामवासी पर्रेगुडा द्वारा किया जाएगा। उक्त जानकारी भोलापठार मीडिया प्रभारी सूरज कौशिक ने दी।

क्या खासियत है इस जगह की

बालोद शहर से राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 930 के गांव से कुछ ही दूरी पर प्रकृति की गोद में एक सुंदर सा पहाड़ है, जिसे भोला पठार के नाम से जाना जाता है. पहाड़ी पर बसे इस मंदिर के प्रति लोगों में काफी आस्था है. इस मंदिर में भोलेनाथ के साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी है. भोला पठार को छत्तीसगढ़ के कैलाश के रूप में भी जाना जाता है.
यह पठार 400 फीट ऊंची है. मंदिर तक पहुंचने के लिए लोगों को लगभग 200 सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है. कहा जाता है कि माता सीता के हरण के बाद जब भगवान राम उन्हें ढूंढने निकले थे तो वे इस पहाड़ी से होकर गुजरे थे. इस दौरान माता पार्वती ने भगवान राम की परीक्षा ली थी, जिस कारण इसे दंडकारण्य क्षेत्र भी कहा जाता है. भगवान राम से भेंट करने के लिए भगवान भोलेनाथ भी इस पहाड़ पर पहुंचे थे. बताया जाता है कि भगवान भोलेनाथ ने कैलाश पर्वत पर वापस जाने से पहले यहां अपना एक भक्त छोड़ा था, ताकि लोग भविष्य में इस जगह के बारे में जान सकें. लोग बताते हैं कि भगवान के उस भक्त को बुझा भगत के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि भगवान शिव उन्हें नींद से उठाकर यहां ले आते थे और वे भगवान शिव की पूजा अर्चना करते थे. बुझा भगत से ही इस मंदिर की पहचान हुई है. सावन और महाशिवरात्रि में यहां हजारों की संख्या में भक्त आते हैं. लोगों का मानना है कि इस मंदिर में आने से उनकी सारी मुरादें पूरी होती है.

कुंड जो कभी नहीं सूखता

बताया जाता है कि मंदिर में एक ऐसा कुंड है, जो कभी नहीं सूखता है. इस कुंड को शिव कमंडल के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि इस कुंड में 12 महीने पानी भरा रहता है. लोग बताते हैं कि इस कुंड के पानी से कई तरह की बीमारियों का इलाज होता है. इस कुंड के पानी से मानसिक तौर पर बीमार लोगों का ईलाज होने के दावा किया जाता है. इसके अलावा शारीरिक समस्या जैसे चर्म रोग, खुजली आदि बीमारी भी इस कुंड के पानी से ठीक हो जाता है.

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