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नवरात्रि विशेष: देव दशहरा में आस्था के केंद्र में जुटेंगे हजारों श्रद्धालु, वनांचल के 52 गांव के लिए है माता काली इष्टदेवी,सबसे पहले होलिकादहन भी होती है यहां…

खारुन नदी के उद्गम पर है मां कंकालिन शक्तिपीठ, जमीन से निकली है मूर्ति, आज लगेगा देव दशहरा मेला

बालोद/गुरूर– नवरात्र के दूसरे दिन हम बालोद जिले के खास मां कंकालिन मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व से आपका परिचय करवा रहे हैं, जहां देश का सबसे पहले देव दशहरा मेला लगता है। नवरात्र पर आने वाले पहले मंगलवार को यहां आयोजन होता है। जिसमें हजारों की भीड़ में श्रद्धालु पहुंचते हैं। बात हो रही है गुरुर ब्लॉक के घने जंगलों के बीच बसे ग्राम पेटेचुआ में धरती चीर कर निकली मां कंकालीन मैया की। जो वनांचल के 52 ग्राम के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र और इष्टदेवी है। खारुन नदी के उद्गम स्थल पर स्थित कंकालीन मंदिर चारों ओर जंगलों से घिरा हुआ है, जो मन को मोहित करता है। मां कंकालीन मंदिर को लेकर जानकारों के अनुसार कंकालीन धरती चीरकर प्रकट हुई हैं और सिद्धीपीठ है। पहले यह मंदिर खुले आसमान के नीचे था, बाद में श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर बनाया गया।

देश के पहले देव दशहरा में जूटते हैं दर्जनों गांव के हजारों लोग

मंदिर के कार्यवाहक अध्यक्ष पीआर ठाकुर ने बताया मंदिर में पितृमोक्ष के बाद प्रथम मंगलवार को देव दशहरा उत्सव मनाया जाता है, जो पूरे भारत वर्ष में पहला दशहरा माना जाता है। देव दशहरा में हजारों की संख्या में अपनी मन्नतें लेकर दर्जनों गांव के हजारों श्रद्धालु बाजे-गाजे, डांग-डोरी लेकर पहुंचते हैं। माना जाता है जो भी सच्चे मन से मां कंकालीन से मनोकामना करते हैं मां उसकी मनोकामना जरूर पूरी करती हैं। माना जाता है कि यहां पूरे भारत में प्रथम देव दशहरा मनाने के साथ ही सबसे पहले होलिकादहन भी किया जाता है, जो फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को किया जाता है। मां कंकालीन देवी में क्वांर मास के शुक्ल पक्ष के पहली मंगलवार को सर्व प्रथम देव दशहरा होता है या पितृपक्ष के बाद पहली मंगलवार,भादो मास के शुक्ल पक्ष के पहली मंगलवार को बाल चढ़ाया जाता है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष के पहली मंगलवार को माता कंकालीन का फाल्गुन त्योंहार मनाया जाता है और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के पहली मंगलवार को मंडई मनाया जाता है। यह मान्यता वर्षों पुरानी पूर्वजों ने चलाते आ रहे हैं जिसे आज भी क्षेत्र वासियों ने अपनी परंपरा को बनाए रखें है। यह कंकालीन मां बालोद , कांकेर ,धमतरी तीनों जिला के बीच में स्थित है। जहां 52 गांव से हजारों की भीड़ में श्रद्धालु जन आते हैं। नवरात्रि में 23 सितंबर को कंकालिन दशहरा पर्व का आयोजन किया गया है।जिसमे छत्तीसगढ़ के नवनिर्वाचित शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव का भी आगमन हो रहा है। जिसमे समिति के लोगों ने तैयारियां प्रारंभ कर दी है।

शासन से धार्मिक पर्यटन स्थल की मांग

समिति एवं ग्रामीणों ने शासन से ग्राम कंकालीन पेटेचुआ में स्थित मां कंकालीन मंदिर को पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि यह मंदिर 7-8 सौ साल से आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां दूर-दूर से मंदिर दर्शन करने हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मंत्री के आगमन से ग्रामीण इसके धार्मिक पर्यटन स्थल घोषित किए जाने को लेकर आशान्वित है।

महुआ बिनने वाले को दर्शन देने जमीन चीरकर निकली है मां काली की मूर्ति

मां कंकालीन मैया की उत्पत्ति को लेकर मंदिर के पुजारी रामकुमार कोमरा ने बताया 7 से 8 सौ साल पहले ग्राम पेटेचुआ निवासी बुजुर्ग चिराम मंडावी दूर जंगल में महुआ बीनने जाते थे। उसके बाद चट्टानी जमीन होने के कारण महुआ को उसी स्थान पर सुखाकर घर वापस आते थे। अगले दिन पुन: उसी जगह पर पहुंचने पर सुखाया हुआ महुआ गायब हो जाता था। यह सिलसिला लगातार चलता रहा, जिससे चिराम मंडावी परेशान हो गया। चिराम माजरे का पता लगाने के लिए रात को उसी स्थान पर रूक गया। उन्होंने रात को देखा कि दिन को रखा महुआ अपने आप गायब हो गया। उसके बाद ग्रामीण चिराम मंडावी ने जंगल में जोरदार आवाज देकर कहा कि कौन है जो मेरे महुआ को गायब किया है, सामने आओ। तब हवा स्वरूप माताजी ने कहा मैं कंकालीन हूं, इस बात पर ग्रामीण चिराम ने यकीन नहीं किया और सामने आने की बात कही। इसी दौरान जोरदार आवाज आई और मां कंकालीन धरती चिरतीं हुईं पत्थर के रूप में प्रकट हुईं और माता ने कहा मैं ही तुम्हारे महुए को गायब करती हूं। माना जाता है कि यह कहते हुए मां कंकालीन चिराम मंडावी के शरीर में प्रवेश कर गईं जिससे चिराम मूर्छित हो गया। यह घटना चलते-चलते सुबह हो गई। तब चिराम की पत्नी उसे खोजने हुए जंगल में महुआ सुखाते के स्थान पर पहुंची। तब वहां जाकर उसने देखा कि चिराम मंडावी मूर्छित अवस्था में पड़े हैं। वह कुछ बोल नहीं पा रहा है। उसने गांव आकर घटना की जानकारी ग्रामीणों को दी। ग्रामीणों ने चिराम को लेकर गांव आए। घर पर चिराम को होश आया। उसके बाद उसने पूरी घटना की जानकारी ग्रामीणों को दी। तब सभी ग्रामीण वापस जंगल पहुंचकर जमीन के अंदर पत्थर तोड़कर प्रकट हुईं मां की पूजा-अर्चना की। तब से लेकर मां कंकालीन की पूजा-अर्चना की जा रही है। माता की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। माना जाता है कि माताजी की मूर्ति उसी जगह स्थापित की गई है जहां माता ने धरती चीरकर प्रकट हुई थीं।

श्रद्धालुओं ने बनवाया है भव्य मंदिर

माता पहले खुले आसमान के नीचे विराजित थीं, उसके बाद ग्रामीणों ने झोपड़ीनुमा मंदिर का निर्माण कराया। पहले खप्परयुक्त मंदिर का निर्माण ग्राम चरोटा के ग्रामीणों ने करवाया था। बताया जाता है कि चरोटा में महामारी व हैजा फैली हुई थी, ग्राम से प्रतिदिन किसी न किसी ग्रामीण की मृत्यु हो रही थी, तब वहां के ग्रामीणों ने पेटेचुआ की मां कंकालीन की शरण में आए, तो बीमारी की परेशानी से उन्हें छुटकारा मिला। इससे लोगों में माता के प्रति आस्था बढ़ी। उसके बाद मंदिर का निर्माण का कारवां बढ़ता गया।

माता के नाम पर कर दिया गया गांव का नाम

गांव के नाम को लेकर जानकारों ने बताया कि पहले गांव का नाम ग्राम पेटेचुआ था। मां कंकालीन के स्थापना के बाद से ग्राम का नाम बदलकर कंकालीन पेटेचुआ किया गया, तब से ग्राम को कंकालीन पेटेचुआ के नाम से जाना जाता है। पेटेचुआ में मां की मूर्ति स्थापना के बाद ग्रामीणों की देख-रेख में ही पूजा किया जाता रहा। 1984-85 में समिति का गठन कर सदस्यों की निगरानी में मंदिर का प्रबंधन किया जाने लगा। अभी समिति में 150 से ज्यादा सदस्य हैं।

बगल में ही है खारुन नदी का उद्गम स्थल

ग्राम कंकालीन पेटेचुआ का जंगल खारुन नदी का उद्गम स्थल है, जो पेटेचुआ से निकलकर सैकड़ों ग्रामों की प्यास बुझाती हुई राजधानी रायपुर पहुंचती है। इस नदी का उपयोग सिंचाई के लिए भी किया जाता है। मां कंकालीन मंदिर के आसपास बईहा बाबा, माडिय़ा बाबा, राजाराव बाबा, शंकर भगवान, लक्ष्मी-सरस्वती एवं मंदिर के प्रवेश द्वार पर हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की गई है।

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