एक गांव ऐसा भी: बर्रापारा संजारी में पूर्वजों की यादें ताजा करने के साथ गांव में आपसी भाईचारा, सामुदायिकता की भावना बढ़ाने का जरिया बना पितृपक्ष



दूसरों से अलग है पितृपक्ष की परंपरा, सुबह चाय, दोपहर और रात में खाने के लिए करते हैं आमंत्रित

बालोद- डौंडीलोहारा क्षेत्र के बर्रापारा संजारी में पितृपक्ष का त्यौहार अलग ढंग से मनाया जाता है। जहां अन्य गांव में पितृपक्ष पर दोपहर में लोगों को आमंत्रित कर पूर्वजों की आत्मा को याद करते हुए भोजन प्रसादी ग्रहण किया जाता है। तो वहीं बर्रा पारा संजारी की परंपरा पूर्वजों के जमाने से अलग ही चली आ रही है। यहां पर जिनके घर भी पितर मनाया जाता है उनके द्वारा अपने गांव के लोगों को सुबह चाय पीने के लिए आमंत्रित करते हैं इसके बाद दोपहर और रात दोनों समय भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है पितर पक्ष पर यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसका पालन आज की पीढ़ी भी कर रही है। पीताम्बर कुमार यादव, मुरारी राम यादव, हरेंद्र दुबे, सुकृत साहू, गोवर्धन यादव, अभयराम साहू, परमानंद सोनवानी, निरचंद निषाद, भंगी राम यादव, विष्णु राम यादव, ब्रह्म यादव, लेखराम साहू आदि ग्राम प्रमुख लोगों ने बताया कि पितृपक्ष जहां आत्माओं के मिलन का एक अवसर होता है तो वही गांव में ऐसी आयोजन से एक दूसरे के बीच भाईचारा, एकता और सामुदायिकता की भावना बढ़ती है। लोग एक दूसरे के सुख-दुख के सहभागी बनते हैं।

पूर्वजों ने बनाई परंपरा, आगे भी रहेगा कायम : डॉ उत्तम यादव

इसी गांव के रहने वाले ठेठवार समाज जिला संगठन के अध्यक्ष व जनपद सदस्य डॉ उत्तम यादव ने बताया कि जो रिवाज पूर्वजों ने बनाकर शुरू किया था उसका हम पालन आज भी कर रहे हैं। आगे भी ये परंपरा इसी तरह से कायम रहेगा।
बालोद जिला का हमारा गांव बर्रापारा संजारी, संजारी बालोद के नाम से चर्चित और आठ पारा संजारी नाम से जाना जाता है। पितृ पक्ष में पुराने जमाने के बुजुर्गों का नियम का पालन आज भी सभी परिवार कर रहा है।

युवा भी निभा रहे इस परंपरा को

वहीं युवा ढालेंद्र यादव ने बताया कि हर साल पितृ का त्योहार बर्रापारा में महत्वपूर्ण रहता है और परिवार को गांव वालों को ऐसे ही अपने माता-पिता बुजुर्गों का आशीर्वाद स्वर्ग से मिलता रहे यही कामना करते हैं। इसी क्रम में शनिवार को ठेठवार यादव समाज के जिला अध्यक्ष जनपद पंचायत के सभापति डॉ उत्तम कुमार यादव की माता जी स्व. सुलोचना बाई यादव का प्रथम मातृ पितृ मिलन रहा। जिसमें पूर्वजों की बनाई परंपरा का निर्वहन किया गया। यह परंपरा न केवल परिवारों के बीच संबंधों को मजबूत बनाती है बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक मूल्यों को जीवित रखा जा सकता है। बर्रा पारा गांव की अनोखी परंपरा निश्चित रूप से प्रेरणादायक है और इसे सुरक्षित करने का प्रयास आज की युवा पीढ़ी भी बखूबी कर रही।

क्या होता है पितृ पक्ष ?

पितृ पक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं। यह अवधि पूर्वजों को समर्पित है। इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में हमारे पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने परिवार को आशीर्वाद देते हैं। यह समय उनकी आत्मा को मुक्ति दिलाने और उनके प्रति सम्मान दिखाने का होता है। इस भवसागर से मुक्त हो चुके पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध पक्ष में जो विधिपूर्वक श्रद्धायुक्त होकर तर्पण, दान आदि किया जाता है उसे श्राद्ध कर्म कहा जाता है। जिसका उद्देश्य अपने पितृगणों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण भाव प्रकट करना है। “श्राद्ध” शब्द स्वयं श्रद्धा से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है, सच्चे मन से, विश्वासपूर्वक और प्रेमपूर्वक किया गया कर्म। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य केवल इस देह से ही नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के संचित पुण्यों और संस्कारों से भी बंधा होता है। जिस देह, ज्ञान, संस्कार और जीवन का हमें वरदान मिला है, वह पितृऋण से अनुप्राणित है। श्राद्ध कर्म के माध्यम से जातक अपने इस पितृऋण का आंशिक निर्वहन करते हैं।

You cannot copy content of this page