शिक्षक दिवस विशेष: पुष्पा चौधरी पेश कर रही स्कूल में रोचकता भरी नवाचार



अफ्रीकन डॉल, वर्ली आर्ट जैसी कलाओं से शिक्षा में ला रही निखार

डीबी डिजिटल मीडिया अर्जुन्दा/बालोद। बालोद जिले के गुण्डरदेही ब्लॉक में ग्राम मटिया (अर्जुन्दा) में स्थित शासकीय मिडिल स्कूल में पदस्थ शिक्षिका पुष्पा चौधरी अपने अनोखे शिक्षा पद्धति और कलाकृतियों की वजह से जानी जाती है। इन दिनों वह स्कूल में अलग से कला क्लास की शुरुआत करते हुए छात्राओं को कागज और रद्दी पेपर से अफ्रीकन डॉल (गुड़िया) सहित अन्य कलाकृति बनाना सिखा रही है। कला शिक्षा में बच्चों को आर्ट क्लास लगाकर कलात्मक सामग्री निर्माण करना सिखाया जा रहा है।

जिसमें खासतौर से कागज से अफ्रीकन डॉल कैसे तैयार करना है यह सब बताया जाता है। शिक्षा में नवाचार की उनकी श्रृंखला काफी लंबी है। ब्लॉक नोडल मास्टर ट्रेनर कला शिक्षा के रूप में समस्त शिक्षकों को उनके द्वारा वर्ली आर्ट सिखाया गया है। यह वर्ली आर्ट महाराष्ट्र के आदिवासियों की एक पारंपरिक लोक कला है। जो वारली जनजाति के लोगों द्वारा विकसित की गई है। इस कला में त्रिकोण, वृत्त और वर्ग जैसी ज्यामिति आकृतियां का उपयोग करके दैनिक जीवन, त्योहार और प्रकृति के दृश्यों को चित्रित किया जाता है। पुष्पा चौधरी द्वारा सभी शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया है।

जिसके बाद अन्य शिक्षक भी अपने अपने स्कूल में बच्चों को वर्ली आर्ट बनाना सिखा रही है। यही सब विविध कलाओं के उदाहरण है जो साबित करते हैं कि पुष्पा चौधरी द्वारा स्कूल में सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान नहीं बल्कि अन्य कलाकृति सिखाने के साथ कई गतिविधियां कराई जाती है।

स्कूल में खुला हमर धरोहर के नाम से संग्रहालय

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिपेक्ष में मटिया स्कूल में एक संग्रहालय का भी शुभारंभ किया गया है। जिसमें पारंपरिक खिलौनों और अन्य प्रकार की सामग्री की प्रदर्शनी लगाई गई है। खासकर पोला उत्सव के दिन दिखने वाले मिट्टी के खिलौने भी इस संग्रहालय में रखे गए हैं। समय-समय पर उन्हें “हमर धरोहर” का नाम देकर बच्चों को उनके बारे में रोचक जानकारी दी जाती है।

विभागीय पुस्तकों में भी छप चुकी है नवाचार की कहानी

पुष्पा चौधरी की नवाचार गतिविधियों को समय-समय पर शिक्षा विभाग की विभिन्न पुस्तकों में भी स्थान भी मिला है। जिसमें कम लागत में सामग्री निर्माण कार्य को प्रमुखता से बताया जाता है। उनके द्वारा कागज से तैयार किए जाने वाले अफ्रीकन डॉल की चर्चा शिक्षा विभाग के पुस्तकों के जरिए पूरे छत्तीसगढ़ में हो रही है। उनके इस नवाचार को शिक्षा विभाग ने अपने प्रकाशित पुस्तकों में शामिल किया है। ताकि पुष्पा के कार्यों से अन्य शिक्षक और बच्चे भी प्रेरित हो सके। प्रकाशित पुस्तकों में उनका उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि राज्य के माध्यमिक शाला मटिया (अर्जुन्दा) की शिक्षक पुष्पा द्वारा विद्यार्थियों को पेपर से अफ्रीकन डॉल बनवा कर लोक कला की शिक्षा दी जा रही है। इस प्रकार कलाकृति निर्माण एवं कला की अभिव्यक्ति के रुपों को एक साथ विद्यार्थियों को सहजता से प्रदर्शन के अवसर मिल रहे है।

सीसीआरटी प्रशिक्षण हेतु गई थी दिल्ली, कर चुकी है राज्य का प्रतिनिधित्व

छत्तीसगढ़ी सवांगा और बांस की कलाकृति को देश के सामने प्रस्तुत की। पुष्पा चौधरी की खूबियों से सिर्फ बालोद जिला और छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग ही परिचित नहीं है बल्कि उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। दिसंबर 2024 में दिल्ली में एक सीसीआरटी प्रशिक्षण का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। “विद्यालय शिक्षा में हस्तकला कौशल का समावेश” इस विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में देशभर से 50 प्रतिभागी शामिल हुए थे. छत्तीसगढ़ से 15 प्रतिभागी गए थे. बालोद जिले से तीन भाग लिए थे। छग की टीम का नेतृत्व पुष्पा चौधरी ने किया था। जहां उन्होंने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुतीकरण के साथ छत्तीसगढ़ी सवांगा (वेशभूषा) और बांस की कलाकृति को राष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन अंदाज में प्रस्तुत किया था। उन्होंने स्वयं छत्तीसगढ़ी सवांगा को धारण करते हुए अपने धरोहर सहित छत्तीसगढ़ के व्यंजन, शिल्प कला,सभ्यता के विषय में जानकारी दी। इस तरह पुष्पा चौधरी ने राज्य टीम का नेतृत्व भी किया था। जो उनके लिए अब तक की एक बड़ी उपलब्धि रही है। इसके अलावा समर कैंप लगाकर प्रशिक्षण भी उनके द्वारा दिया जाता है। कबाड़ से जुगाड़ कर विविध कलाकृति वे तैयार करती हैं और इनका शिक्षा को आसान और रक्षक बनाने में इस्तेमाल करती हैं। छत्तीसगढ़ी सवांगा का भी प्रचार करते हुए वे लगातार कार्य कर रही हैं।

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