स्मृति शेष… अमर राग



रचना: ऋचा चंद्राकर,कौंदकेरा (महासमुंद)

तुम मिट्टी नहीं हुए जवान! प्रेम तुम्हारा अमर रहेगा,
तुम्हारा समर्पण देश के खातिर युगों-युगों तक याद रहेगा।

एक सुहागन लेकर बैठी, अपनी सिंदूर दानी,
रखे धैर्य, करे प्रतीक्षा—आँखों में बसी कहानी।
जाने कितने अरसे बीते, पर आस नहीं उसने तोड़ी,
निज प्रियतम के आने की, विश्वास नहीं उसने छोड़ी।

प्रीति बही निःशब्द धार में, प्रेम तुम्हारा अमर रहेगा।
तुम्हारा समर्पण देश के खातिर युगों-युगों तक याद रहेगा।

जब आँखों का अंजन धुला, निज आँखों के पानी से,
केवल सिसकती रही देखकर, बोल न पाई वाणी से।
तिरंगे से जब लिपटकर, आया वह देश का वीर जवान,
सारे सपने सिमट गए, पर हुआ उसे प्रियतम पर शान।

सब मीठी यादों के संग में, प्रेम तुम्हारा अमर रहेगा,
तुम्हारा समर्पण देश के खातिर युगों-युगों तक याद रहेगा।

ऋचा चंद्राकर

कौंदकेरा (महासमुंद)

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