गुरु पूर्णिमा विशेष: संस्कारों का मंदिर कहलाते हैं ये स्कूल,आज भी कायम है यहां गुरु शिष्य की परंपरा..



शिक्षा के साथ यहां बच्चे सीखते हैं संस्कार,बड़े होकर भी उन आदतों को नहीं भूलते, बदलते दौर में अपनी सभ्यता और संस्कृति को बचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं ऐसे विद्यालय

बालोद। आज गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है । आज कई स्कूलों में  शिक्षा व्यवस्था किताबी ज्ञान तक सीमित हो गई है। लेकिन सरस्वती शिशु मंदिर ऐसे विद्यालय के रूप में आज भी अपनी पहचान कायम करके रखे हुए हैं जहां शिक्षा के साथ बच्चों को संस्कारवान भी बनाया जाता है। बालोद जिले की बात करें तो यहां 47 ग्रामीण क्षेत्र में और पांच शहरी क्षेत्र मिलाकर कुल 52 सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय संचालित है। जिनमें 337 शिक्षक अपनी सेवा दे रहे हैं और इन विद्यालयों में 6147 बच्चे पढ़कर अपना भविष्य संवार रहे हैं। इस गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हमने सरस्वती शिशु मंदिर में अन्य स्कूलों से पृथक शिक्षण व्यवस्था के बारे में जानकारी हासिल की तो यह बात निकलकर सामने आज कि आज भी इन स्कूलों में गुरु शिष्य की परंपरा कायम है। हिंदी,  छत्तीसगढ़ी के साथ-साथ इन स्कूलों में संस्कृत भाषा को भी प्राथमिकता दी जाती है। कक्षा तीसरी से ही यहां के बच्चों को संस्कृत पढ़ाया जाता है। विद्यालय में आम बोलचाल की भाषा में भी कई शब्द संस्कृत के शामिल किए जाते हैं। इस विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों में संस्कार ऐसा होता है कि स्कूल में जो सीखते हैं उसे घर पर भी पालन करते हैं और स्कूल से निकल जाने के बाद बड़े होने पर भी उनमें यह भाव झलकता है।  साढ़े तीन साल की उम्र से ही बच्चों को यहां विद्यारंभ संस्कार देने के साथ-साथ उन्हें विविध मंत्र , श्लोक बोलने में दक्ष किया जाता है। यह इस विद्यालय की एक विशेष पहचान है। गुरु शिष्य परंपरा और रिश्ते की परिचायक की बात करें तो इन विद्यालयों में गुरु पूर्णिमा विशेष रूप से मनाई जाती है और दक्षिणा स्वरूप बच्चे अपने-अपने कक्षाचार्य , प्रधानाचार्य को भेंट प्रदान करते हैं  संस्कारों की बात करें तो पांच मूलभूत शिक्षण व्यवस्था इन स्कूलों में लागू है। जिसमें धार्मिक, शारीरिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, नैतिक शिक्षा शामिल है। बच्चों को यहां तीसरी कक्षा से ही हमारे धार्मिक हिंदू ग्रंथ से परिचय कराया जाता है। जहां बच्चे शासन द्वारा तय पाठ्यक्रम तो पढ़ते ही हैं वहां रामायण, महाभारत, गौरव गाथा  और वैदिक गणित ज्योतिष आदि की शिक्षा भी ग्रहण करते हैं। जैसा पहले ऋषि मुनियों के काल में हुआ करता था। ऐसे ही कुछ परंपरा आज भी सरस्वती शिशु मंदिर में देखने को मिलती है।

हर मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ तो वही भोजन से पहले भजन, दीप मंत्र, भोजन मंत्र सहित कई संस्कारों के दौरान किया जाने वाला मंत्र पाठ यहां बच्चे और शिक्षक दोनों ही करते हैं। कुटुंब प्रबोधन का नवाचार भी यहां हो रहा है। जिसके तहत शिक्षकों से शुरुआत करते हुए इसे बच्चों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके तहत स्कूल के अलावा घर में भी संस्कारों को बढ़ावा देने के लिए हफ्ते में एक दिन परिवार के सभी सदस्य एक साथ भोजन करते हैं, पूजा करते हैं ताकि आपसी सामंजस्य और स्नेह का भाव बना रहे। सरस्वती शिशु मंदिर की संचालक संस्था विद्या ग्राम भारती के जिला संयोजक दीपक हिरवानी ने बताया कि बच्चों का सर्वांगीण विकास हो यह हमारी कोशिश होती है। बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं बल्कि विविध शिक्षा और संस्कार देने का काम सरस्वती शिशु मंदिर में होता है। शारीरिक शिक्षा, योग और संस्कारों की शिक्षा को काफी महत्व दिया जाता है। साढ़े 3 साल की उम्र से ही बच्चे जब सरस्वती शिशु मंदिर में प्रवेश करते हैं तो उन्हें  यहां के माहौल में धीरे-धीरे ढलने में ज्यादा समय नहीं लगता  विविध संस्कार यहां बच्चों को सिखाए जाते हैं तो वही बच्चों को सीखाने से पहले संबंधित आचार्य और दीदीयों को भी हर महीने आवर्ती बैठक लेकर उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है ताकि वे जब बेहतर होंगे तो बच्चों को भी बेहतर शिक्षा और संस्कार दे सकेंगे। यहां के शिक्षकगण भी अल्प मानदेय पर समर्पण भाव के साथ अध्यापन का कार्य करते हैं। आज के महंगाई के दौर में अल्प मानदेय से गुजारा तो मुश्किल होता है फिर भी शिक्षा और संस्कार को बढ़ावा देते हुए सेवा भाव के रूप में यहां शिक्षक बच्चों को पढ़ाते हैं।

मकर संक्रांति पर दान इकट्ठा कर भेजते हैं आश्रम या नक्सल प्रभावित क्षेत्र के विद्यालयों के लिए

सरस्वती शिशु मंदिर द्वारा सभी बच्चों और पालकों से मकर संक्रांति पर दान स्वरूप दाल और चावल लेकर हर साल जरूरतमंद आश्रम या नक्सली प्रभावित क्षेत्र के स्कूलों के लिए भेजा जाता है । बसंत पंचमी को समर्पण दिवस के रूप में मनाते हैं और प्रत्येक छात्र से ₹21 दान लिया जाता है। बच्चों को जन्मदिन पर केक काटने की बजाय दीप जलाकर दीप मंत्र बोलकर खीर पुरी का प्रसाद बटवाने के लिए प्रेरित किया जाता है और कई बच्चे इसका अनुसरण भी करते हैं । जिला ग्राम भारती के पूर्व अध्यक्ष राजेश्वर राव कृदत्त ने बताया कि सरस्वती शिशु मंदिर में नवीन परिवेश के साथ-साथ हमारे प्राचीन सभ्यता को भी बच्चों को समझने और उन्हें अपने जीवन में उतारने के लिए प्रेरित किया जाता है। बच्चे सुबह उठकर माता-पिता को प्रणाम करते हैं तो वही बच्चों की पढ़ाई सही हो रही है या नहीं घर में उनका व्यवहार कैसा है, यह जानने के लिए सरस्वती शिशु मंदिर में  अभिभावक संपर्क की विशेष व्यवस्था है। जिसके तहत स्वयं शिक्षण प्रत्येक छात्र के घर जाकर उनके पालकों से बच्चों का फीडबैक लेते हैं। उनमें क्या कमी है, क्या सुधार हो रहा है और क्या सुधारने की जरूरत है? इस तरह शिक्षक, पालक और बच्चों तीनों में आपसी सामंजस्य और समन्वय का भाव देखने को मिलता है।

इन विषयों की होती है पढ़ाई

बालोद सरस्वती शिशु मंदिर के प्राचार्य दीनदयाल साहू ने बताया शासन द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अलावा सरस्वती शिक्षण संस्थानों में सदाचारी, वैदिक गणित, संस्कृत विषय शुरुआत से पढ़ाया जा रहा है। जिससे एक नए उत्साह के साथ बच्चे अध्ययन करते हैं। विविध प्रार्थना दैनिक उपासना होती है। जिसमें प्रातः स्मरण, एकात्मकता, स्तोत्र एकात्मकता मंत्र के साथ ही मां की वंदना, गायत्री मंत्र प्रतिदिन बच्चों को बोलाया जाता है। साढे तीन साल की उम्र से ही बच्चों को प्रवेश देकर मंत्र उच्चारण करना सिखाया जाता है ताकि बच्चे भविष्य में एक अच्छे इंसान बन सके और आध्यात्मिक दृष्टिकोण बना रहे। जगन्नाथपुर सरस्वती शिशु मंदिर के प्राचार्य ताराचंद साहू ने बताया कि बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए एक विशेष पहल यहां की जाती है ताकि हमारी संस्कृति और सभ्यता को बच्चे आगे चलकर बनाए रखें। समय समय पर भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा भी संस्थान द्वारा आयोजित की जाती है ।जिससे बच्चे और बेहतर होते हैं। आचार्य और दीदी गण अभिभावक के घर प्रत्यक्ष संपर्क कर बच्चों की दिनचर्या और फीडबैक लेकर सुधार करते हैं।

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