DAILY BALOD NEWS

EDITOR IN CHIEF – DEEPAK YADAV.9755235270

Advertisement

महाशिवरात्रि विशेष : जगन्नाथपुर में बन रही है 33 फीट ऊंची महादेव की प्रतिमा, 11वीं शताब्दी का प्राचीन शिव मंदिर भी है यहां

गांव को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने सरपंच सहित ग्रामीण और दानदाता कर रहे प्रयास, जल्द शुरू होगी यहां बोटिंग की सुविधा

ग्रामीणों ने की है शासन से यहां पर्यटन को बढ़ावा देने विकास कार्यों की मांग, शिवरात्रि पर होंगे विविध आयोजन

बालोद। आज महाशिवरात्रि के अवसर पर हम बालोद जिले के ग्राम जगन्नाथपुर में स्थित 11वीं शताब्दी के प्राचीन शिव मंदिर के साथ-साथ यहां वर्तमान में बन रहे 33 फीट के ऊंचे महादेव की प्रतिमा के बारे में बता रहे हैं। जिससे अब इस गांव को बालोद जिला सहित पूरे राज्य में एक नई पहचान मिलने जा रही है। सरपंच अरुण साहू के प्रयास से प्राचीन शिव मंदिर और बांध के तट पर सौंदर्यीकरण के साथ-साथ 33 फीट ऊंचे महादेव की प्रतिमा निर्माण का कार्य जारी है। जिससे बालोद जिले के पर्यटन के नक्शे पर जगन्नाथपुर एक नई पहचान बना पाएगा।वर्तमान भाजपा सरकार जहां पर्यटन को उद्योग का दर्जा देकर राज्य के पर्यटन स्थलों को बढ़ावा देने का प्रयास कर ही है। तो वही जगन्नाथपुर के ग्रामीण और पंचायत प्रतिनिधि भी जिला प्रशासन की पहल का इंतजार कर रहें हैं कि कब यहां कलेक्टर या कोई जिम्मेदार अधिकारी आए और इस जगह को देखकर शासन की योजना के तहत इसका उद्धार करें। 11वीं शताब्दी का प्राचीन शिव मंदिर पुरातत्व विभाग के तहत संरक्षित स्थल भी है। बावजूद यहां विभाग की ओर से आज तक कोई संरक्षण के कार्य नहीं कराए गए। जो भी कार्य स्थानीय सरपंच, ग्राम वासियों और दानदाताओं की मदद से ही होते आए हैं। महाशिवरात्रि पर प्राचीन शिव मंदिर में विशेष पूजा अर्चना होती है। वही नवदंपति यहां कुशल मंगल गृहस्थ जीवन की कामना के साथ महाशिवरात्रि के पूजन में विशेष रूप से शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं के लिए खीर पूड़ी प्रसाद का वितरण किया जाता है।

होगी जल्द ही बोटिंग की शुरुआत, आ चुके हैं चार नाव

निवर्तमान सरपंच अरुण साहू ने बताया कि जल्द ही इस बांध में बोटिंग की शुरुआत भी होने वाली है। जिला प्रशासन की ओर से हमें चार बोट मिले हैं। जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह चंद्रवाल और जिला पंचायत सीईओ संजय कन्नौजे की पहल से यहां जल्द ही बोटिंग की सौगात ग्रामीणों को मिलने वाली है। समय-समय पर जिला और जनपद प्रशासन का सहयोग मिलता आया है। इस स्थल को और बेहतर तरीके से विकसित करने के लिए हम चाहते हैं कि स्वयं जिला प्रशासन की ओर से कलेक्टर या अन्य अधिकारी यहां आए और इस स्थल का जायजा लेकर अन्य पर्यटन की संभावनाओं पर काम हो सके। नौकाचालन का नवनिर्वाचित सरपंच के पदभार ग्रहण करने के साथ विधिवत इसका शुभारंभ करवाया जाएगा। अभी कुछ काम शेष हैं। बोटिंग के लिए मछुआ समिति या पंचायत को अधिकृत जिम्मेदारी देकर उसके रखरखाव और सशुल्क इसकी पर्यटकों को सुविधा देने की योजना है। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन एक बार इस जगह पर आकर देखें तो इस जगह का और बेहतर तरीके से उद्धार किया जा सकता है। अपने स्तर पर वे जितना हो सके अपने कार्यकाल के दौरान इस जगह को पर्यटन स्थल बनाने के लिए प्रयास करते रहे हैं । दानदाताओं की मदद सहित स्वयं के लगभग 9 लाख रुपए अब तक खर्च कर वर्तमान में यहां महादेव की मूर्ति निर्माण सहित विविध कार्य किए जा रहे हैं। अनुमान है कि आने वाले तीन-चार महीने के भीतर मूर्ति का निर्माण पूरा हो जाएगा। तो वही जिला प्रशासन अगर इस ओर ध्यान दें तो इसे और बेहतर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। यहां पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। तो वहीं प्राचीन शिव मंदिर को सहेजने की भी जरूरत है।

मंदिर के निर्माण से जुड़ा है गांव का नामकरण

ज्ञात हो कि 11वीं शताब्दी के उक्त प्राचीन व ऐतिहासिक मंदिर की अपनी पौराणिक मान्यता तो है ही, ऐतिहासिक महत्व भी है। इस मंदिर निर्माण से गांव का नाम भी जुड़ा हुआ है। पुरी के जगन्नाथ से प्रेरित होकर गांव का नाम जगन्नाथपुर पड़ा है। बालोद अर्जुन्दा मार्ग पर स्थित गांव की सीमा पर यह प्राचीन शिव मंदिर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। इसकी महत्ता से अधिकतर लोग अनजान है तो वही कहानी से भी। हमने इस मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी ली तो यह रोचक तथ्य सामने आया कि गांव का नाम ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा है। इसके पीछे जगदलपुर के राजा का भक्ति भाव और मंदिर निर्माण का प्रयास बताया जाता है। बुजुर्गों से सुनी जा रही किवंदती अनुसार ऐसी मान्यता है कि जगदलपुर के राजा-रानी ओडिशा के जगन्नाथ मन्दिर की यात्रा में गए थे। वहां से लौटते समय तत्कालीन ग्राम डुआ (वर्तमान नाम जगन्नाथपुर) में विश्राम के लिए रुके थे। यहां का माहौल पुरी की भांति भक्ति पूर्ण रहता था, जिसे देखते हुए राजा रानी के द्वारा यहां पर दो शिवलिंग मंदिर का निर्माण किया गया। जिसमें एक मंदिर नष्ट हो चुका है और एक अस्तित्व में हैं।

जगदलपुर के राजा रानी ने किया नामकरण

जगदलपुर के राजा रानी के द्वारा ही गांव का नाम पुरी के माहौल की तरह होने के कारण डुआ से जगन्नाथपुर रखा गया। वर्तमान में पुरातत्व विभाग द्वारा इसके संरक्षण को लेकर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। इसके चलते प्राचीन मंदिर के भी नष्ट होने का खतरा बना हुआ है। यह पुरातत्व विभाग का संरक्षित स्मारक है इसलिए मूल प्राचीन मंदिर में पंचायत प्रशासन या कोई व्यक्तिगत भी छेड़छाड़ नहीं कर सकते। इसलिए आस-पास ही सौंदर्यीकरण कराया जा सकता है।

11वीं शताब्दी से स्थापित है मंदिर

जगन्नाथपुर के जलाशय स्थित भगवान शिवजी व गणेशजी की मूर्ति प्राचीन काल से निर्मित है जो देखरेख के अभाव में जीर्ण शीर्ण स्थिति में अपने अस्तित्व खोता जा रहा है। ग्राम जगन्नाथपुर में तालाब पार स्थित शिवजी व गणेशजी की मन्दिर 11 शताब्दी से स्थापित है। 11वीं शताब्दी में जब जगदलपुर से राजवाड़ा से राजा रानी पुरी के भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने गए थे उस समय जब दर्शन करके वापस जगन्नाथपुर में विश्राम करने रुके थे, उस समय उन्होंने ग्राम जगन्नाथपुर का नाम प्राचीन नाम डुआ से बदलकर रखा था, उसी समय विश्राम पश्चात उन्हीं के द्वारा 2 मंदिरों का निर्माण कराया गया, उस समय राजा रानी को इस गांव का वातावरण जगन्नाथपुरी जैसा लगा। उसी समय विश्राम पश्चात उन्हीं के द्वारा छमाही रातों में दो मंदिरों का निर्माण कराया गया, जिसमें भगवान शिवजी का शिवलिंग व भगवान गणेश जी की मूर्ति का स्थापना कर प्राण प्रतिष्ठा कराया गया। इसका एक मंदिर देखरेख के अभाव में क्षतिग्रस्त होकर ढह गया है। लोगों का मानना है कि आज जो एक मंदिर बचा हुआ है उस मंदिर पर नाग नागिन का जोड़ा वहां आज भी विचरण करते हैं।

ऐसी है मन्दिर की बनावट

मंदिर के ऊपर विष्णु चक्र सुदर्शन आकार का गुंबद भी बना हुआ है । इसी मंदिर में सुदर्शन चक्र की तरह दो पत्थर और भी हैं। ग्राम में एक कहानी भी प्रचलित है कि उक्त सुदर्शन पत्थर पर बैठकर पहले कोई ग्रामीण स्नान करता तो वह पत्थर तैरते हुए बीच तालाब में ले जा कर ग्रामीण को डूबा देता था और वापस अपने स्थान पर आ जाता था वह पत्थर आज भी देवालय में रखा हुआ है। हालांकि ये सिर्फ किवदंती है वर्तमान में ऐसे चमत्कार नही होते मंदिर बनाते समय उसी जगह एक बड़े तालाब का भी निर्माण 11वीं शताब्दी में किया गया था, उसके बाद सन 1972 में सिंचाई विभाग द्वारा लगभग 100 एकड़ भूमि इसी तालाब से लगा बांध का निर्माण किया गया। इसके साथ ही यह मंदिर आसपास के गांव में प्रतिष्ठित पौराणिक व एक प्राचीन मंदिर के रूप में ग्राम जगन्नाथपुर प्राचीन नाम से जाने जाते है जो कि पुरातत्व विभाग की अनदेखी की वजह से अस्तित्व खो रहा है।

You cannot copy content of this page