बालोद। महाशिवरात्रि का महापर्व कई आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए है। यह पर्व सभी पर्वो में महान और श्रेष्ठ है, क्योंकि शिवरात्रि परमात्मा के दिव्य अवतरण का यादगार महापर्व है। परमात्मा ने श्रीमद् भगवत गीता में कहा है ‘यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।।’ बी.के. विजयलक्ष्मी संचालिका बालोद
आत्मज्ञान भवन आमापारा बालोद ने कहा कि गीता के उक्त श्लोक में किए अपने वादे के अनुसार-परमात्मा कहते है कि जब-जब इस सृष्टि पर धर्म की अति ग्लानि हो जाती है, अधर्म और पापकर्म बढ़ जाते है, तब मैं भारत सहित पूरी सृष्टि का उत्थान करने और नई दुनिया की सृजन करने साकार रूप में लोंगो के सम्मुख प्रकट होता हूं। मैं इस धरा पर अवतरित होकर सज्जन-साधु लोंगो की रक्षा, दुष्टों का विनाश और एक सतधर्म की स्थापना करता हूं। चारों युगों में कल्प के अंत में एक बार ही मेरा इस धरा पर अवतरण होता है।
ज्योतिर्बिंदु स्वरूप है परमात्मा
भारत में 12 ज्योतिर्लिंग प्रसिध्द है और गली-गली में शिवालय बने हुए है। इससे स्पष्ट होता है कि वह परमपिता परमात्मा कभी इस सृष्टि पर आएं है और विश्व कल्याण का कार्य किया है, तभी तो हम उन्हें याद करते है। परमात्मा का स्वरूप ज्योतिर्बिंदु है। श्रीमद्भगवत गीता से लेकर महाभारत, शिवपुराण, रामायण, यजुर्वेद, मनुस्मृति सभी में कहीं न कहीं परमात्मा के अवतरण की बात कही गई है। किसी भी धर्मग्रंथ में परमात्मा के जन्म लेने की बात नहीं है। हर जगह प्रगट होने, अवतरण पर परकाया प्रवेश की बात को ही इंगित किया गया है। क्योंकि परमात्मा का अपना कोई शरीर नहीं होता है। वह परकाया प्रवेश कर नई सतयुगी सृष्टि की स्थापना का दिव्य कार्य कराते है। यहां तक कि शिवपुराण में स्पष्ट लिखा है कि मै ब्रह्मा के ललाट से प्रकट होऊंगा। शिव जन्म-मरण से न्यारे है। ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के भी रचयिता त्रिमूर्ति है, जिन्हें हम परमात्मा शिव कहते है।
शिव और शंकर में है महान अंतर
परमपिता शिव और शंकर जी में महान अंतर है। शिव जी और शंकर जी में वही अंतर है जो एक पिता-पुत्र में होता है। इस सृष्टि के विनाश कराने के निमित्त परमात्मा ने ही शंकर जी को रचा। यहीं नहीं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के रचनाकार, सर्वशक्तिवान, सर्वोच्च सत्ता, परमेश्वर शिव ही है। वह ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की स्थापना, शंकर द्वारा विनाश और विष्णु द्वारा पालना कराते है। ‘शिवलिंग’ परमात्मा शिव की प्रतिमा है। परमात्मा निराकार ज्योति स्वरूप है। शिव का अर्थ है ‘कल्याणकारी’ और लिंग का अर्थ है ‘चिन्ह’ अर्थात् कल्याणकारी परमात्मा को साकार में पूजने के लिए ‘शिवलिंग का निर्माण किया गया। शिवलिंग को काला इसलिए दिखाया गया क्योंकि अज्ञानता रूपी रात्रि में परमात्मा अवतरित होकर अज्ञान-अंधकार मिटाते है। परमपिता परमात्मा शिव 33 करोड़ देवी-देवताओं के भी महादेव एवं समस्त मनुष्यात्माओं के परमपिता है। सारी सृष्टि में परमात्मा को छोड़कर सभी देवी-देवताओं का जन्म होता है जबकि परमात्मा का दिव्य अवतरण होता है। वे अजन्मा, अभोक्ता, अकर्ता और ब्रह्मलोक के निवासी है। शंकर का आकारी शरीर है। शंकर, परमात्मा शिव की रचना है। यही वजह है कि शंकर हमेशा शिवलिंग के सामने तपस्या करते हुए दिखाए जाते है।
शिवलिंग पर तीन रेखाएं ही क्यों?
शिवलिंग पर तीन रेखाएं परमात्मा द्वारा रचे गए तीन देवताओं की ही प्रतीक है। परमात्मा शिव तीनों लोंको के स्वामी है। वे प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सतयुगी दैवी सृष्टि की स्थापना, विष्णु द्वारा पालना और शंकर द्वारा कलियुगी आसुरी सृष्टि का विनाश कराते है। इस सृष्टि के सारे संचालन में इन तीनों देवताओं का ही विशेष अहम योगदान हे।
शिव के साथ क्या है रात्रि का संबंध?
विश्व की सभी महान विभूतियों के जन्मोत्सव मनाए जाते है, लेकिन परमात्मा शिव की जयंती को जन्मदिन न कहकर शिवरात्रि कहा जाता है, आखिर क्यों? इसका अर्थ है परमात्मा जन्म-मरण से न्यारे है। उनका किसी महापुरूष या देवता की तरह शारीरिक जन्म नहीं होता है। वह अलौकिक जन्म लेकर अवतरित होते है। उनकी जयंती कर्तव्य वाचक रूप से मनाई जाती है। जब-जब इस सृष्टि पर पाप की अतिधर्मग्लानि होती है और पूरी दुनिया दुखों से घिर जाती है तो गीता में किए अपने वायदे अनुसार परमात्मा इस धरा पर अवतरित होते है।
शिव कौन है?
भारत देश 33 करोड़ देवी-देवताओं का देश है। परन्तु इन सभी देवताओं को बनाने वाले एक ही परमपिता परमात्मा शिव है, जिसकी अनेक धर्मों, अनेक रूपों में भले ही पूजा की जाती है परन्तु उसका केन्द्र-बिंदु परमात्मा शिव के पास ही जाकर समाप्त होता है। परमात्मा शिव देवों के भी देव महादेव, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के भी रचयिता त्रिमूर्ति, तीनों लोको के मालिक त्रिलोकीनाथ, तीनों कालों को जानने वाले त्रिकालदर्शी है। विश्व की सभी आत्माओं के परमपिता परमात्मा शिव है। परमात्मा जन्म-मरण से न्यारे है। उनका जन्म नहीं होता बल्कि परकाया प्रवेश होता है।
वर्तमान कलियुग का सारा काल ही महारात्रि
वर्तमान समय कलियुग का अंतिम चरण चल रहा है। यह सारा काल, रात्रि अथवा महारात्रि ही है। हम सभी नर-नारियों को यह शुभ संदेश देना चाहते है कि अब परमपिता परमात्मा शिव संसार को पावन तथा सुखी बनाने के लिए फिर से प्रजापिता ब्रह्मा के तन में अवतरित होकर सहज राजयोग की शिक्षा दे रहे है।
तेजी से बदल रहा दुनिया का परिदृश्य
सृष्टि का शाश्वत नियम है कि कोई भी चीज हमेशा अपने मूल स्वरूप में नहीं रहती है। बदलाव या परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जैसे- दिन के बाद रात और रात के बाद दिन का आना तय है, उसी तरह सृष्टि चक्र में सतयुग के बाद त्रेतायुग, द्वापरयुग और फिर कलियुग क्रम से आना तय है। समय रहते इसे गंभीरता से समझने की जरूरत है। क्योंकि यह बदलाव ईश्वरीय संविधान का हिस्सा है, जो मानव के हित में है।
मानवीय मूल्यों का पतन और पुनर्स्थापना
व्यक्ति के कर्म इतने निम्न स्तर पर पहुंच गए है जिनकी कभी कल्पना नहीं की होगी। धर्मशास्त्रों में धर्मग्लानि के जो चिंन्ह बताए गए है उससे भी निम्न दर्जे की घटनाएं सामने आ रही है, जिसने हमारे मानव होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिए है। सृष्टि के विनाश और नवयुग के सृजन का ये वीर संधिकाल ‘संगमयुग’ चल रहा है।
