पंचायत चुनाव में दिख रहे अजब गजब नजारे: प्रत्याशी है पत्नियां, प्रचार कर रहे पति, पोस्टर पर भी दोनों की तस्वीरें



आखिर कब बंद होगी कठपुतली जनप्रतिनिधि की परंपरा?

बालोद। हाल ही में नगरीय निकाय के चुनाव संपन्न हुए हैं तो वहीं कुछ दिनों में अब त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के तहत अलग-अलग चरण में गांव में सरपंच, पंच, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य के लिए चुनाव होने हैं। शासन द्वारा पंचायती राज अधिनियम के तहत महिलाओं को 50% आरक्षण दिया जाता है। जिसके तहत अधिकतर सीटों में महिलाएं द्वारा ही दावेदारी कर मैदान में उतरते ही चुनाव प्रचार शुरू कर दिया गया है। लेकिन यह एक विडंबना ही कह सकते हैं कि महिलाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास करने वाले निर्वाचन आयोग और अधिनियम के बाद भी वे कठपुतली जन्म प्रतिनिधि बनने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। कठपुतली जन प्रतिनिधि की पहचान से महिलाएं आजाद नहीं हो पा रही है। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि अधिकतर जितने भी प्रत्याशी इन दिनों मैदान में है उनके चुनावी पोस्टर में पति के साथ ही तस्वीर सामने आ रहे हैं। कई लोग तो चुनाव लड़ने के लिए अपने नाम के पीछे पति के ही नाम का इस्तेमाल कर रहें। ऐसे में सवाल यही उठता है कि क्या व्यक्तिगत छवि या स्वयं की पहचान पर महिलाएं चुनाव नहीं लड़ पाती। जीत के बाद फिर वही होता है कि वे कठपुतली बनकर रह जाती है और जैसा पंचायत में देखने को मिलता है कि सरपंच महिला हो तो वह सिर्फ हस्ताक्षर करने वाली बनकर रह जाती है और सारा कामकाज सरपंच पति जिसे गांव में एसपी के नाम से जाना जाता है, उनके जिम्मे रहता है। जिसके चलते कई बार पंचायत में अविश्वास प्रस्ताव की स्थिति भी आ जाती है। इस बार आरक्षण में कई दिग्गज नेताओं के मंसूबों पर पानी फिरा है। महिला आरक्षण आने की वजह से भी वे अपनी पत्नियों को मैदान में उतारे हुए हैं लेकिन प्रचार प्रसार खुद के चेहरे पर ही हो रहा है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण इन दिनों पंचायत चुनाव में देखने को मिल रहे हैं। जहां पत्नियां अपने पति के बलबूते या नाम और चेहरे के सहारे ही चुनाव लड़ रही हैं। कुछ ही नेत्रियां हैं या कुछ ही महिला प्रत्याशी हैं जो स्वयं के दम पर मैदान में अपना भाग्य आजमा रहे हैं।

जीत के बाद चलता है फिर पतियों का ही राज

अक्सर यही देखा जाता है कि चुनाव परिणाम आते हैं और जो भी महिला प्रत्याशी जीतते हैं तो जीत के बाद उनका काम उनके पतियों द्वारा ज्यादा चलता है। कई शासकीय कार्यों में भी हस्तक्षेप पतियों का नजर आता है। हालांकि वे शासकीय बैठकों में अपनी पत्नी के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल नहीं हो पाते लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उनका निर्णय भी उन बैठकों के निर्णय को प्रभावित करता है। अप्रत्यक्ष दबाव हो या प्रत्यक्ष हो किसी भी तरह के निर्णय या विकास कार्यों में महिला सरपंचों के पीछे उनके पतियों का ही हाथ होता है। जिससे कई बार गांव में वाद विवाद या अविश्वास प्रस्ताव तक की स्थिति आ जाती है। वर्तमान में सरपंच,जनपद, जिला पंचायत तक के चुनाव में भी ऐसा ही माहौल बनता नजर आ रहा है। जो पहले सरपंच, जनपद सदस्य या जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं इस बार महिला आरक्षण आने पर अपनी पत्नियों को चुनाव के मैदान में उतारे हुए हैं और जनता के बीच जाकर अपने ही नाम से प्रचार कर रहें। ऐसे में सवाल भी यही उठता है कि आखिर महिलाओं को जो 50% आरक्षण मिलता है वह कहां तक औचित्य पूर्ण है।

सिर्फ साक्षर होना जरूरी, पहले थी शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता

वर्तमान में पंचायत चुनाव में सिर्फ साक्षर होना जरूरी है। यानी कि जो भी प्रत्याशी हैं उन्हें कम से कम हस्ताक्षर करने आना चाहिए। एक वक्त होता था जब पंचायत चुनाव में पांचवी या आठवीं कम से कम पास होना जरूरी होता था। लेकिन पंचायत अधिनियम में संशोधन कर उक्त शैक्षणिक योग्यता को हटाकर साक्षरता के रूप में स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद यह देखने को मिलता है कि कई गांव में कम पढ़ी-लिखी महिलाएं आरक्षण के कारण चुनाव में खड़ी होती है और अगर जीत भी जाती है तो उस स्तर तक गांव का विकास नहीं कर पाती ना ही अपने गांव को आगे बढ़ा पाती है। जैसे एक शिक्षित सरपंच या जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य कर पाते हैं। ऐसे में स्वशासन और शासन की योजनाओं का असल लाभ आम जनता तक भी नहीं पहुंच पाता।

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