अच्छे भाव और प्रेम बाटेंगे तो आपके साथ भी सब अच्छा होगा, दूसरों के प्रति जो शिकायत है वह लिखकर देखें, आप में भी वही शिकायत नजर आएगी



बालोद। सहजानंद चातुर्मास में प्रवचन श्रृंखला के पांचवें दिन महावीर भवन में विराजित परम पूज्य श्री ऋषभ सागर जी ने लोगों को आपस में प्रेम बांटने की नसीहत दी और यह भी कहा कि आप अगर किसी के भीतर कोई गलतियां ढूंढ रहे हैं या उन्हें गलत समझते हैं तो सबसे पहले अपने भीतर झांक कर देखिए की क्या आप में तो वह गलतियां नहीं है। पहले सुधार खुद से करिए। फिर आसपास का वातावरण और रिश्ते अपने आप सुधर जाएंगे। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय सत्संग के माध्यम से हम यह सोचने का प्रयास कर रहे कि हमारा जीवन में क्या बदलाव और हमारा जीवन कैसा हो । जीवन तो कीड़े मकोड़ों का भी होता है और महापुरुषों का भी होता है। लेकिन इसमें अंतर क्या है। एक को अंतर पता था इसलिए वे अच्छे से जी पाए पर जो समझ नहीं पाए वह अपने जीवन को कीड़े मकोड़े की तरह बर्बाद कर देते हैं। हम भी जीवन जीते हैं कैसे रिश्ते जुड़ते हैं। केवल चेतन नहीं जड़ से भी रिश्ता है। रिश्तो का साथ हम कैसे देते हैं वही हमारे जीवन का आधार बनता। हम देखें कि दूसरों के साथ हमारा व्यवहार कैसा है। यदि हमारा व्यवहार और सोच बुरी है तो सब बुरा है। अपने आसपास के लोगों के साथ अच्छा रिश्ता जोड़ उनके बारे में अच्छा सोचे, बोले, सुने। जब व्यक्ति बुरा देखना, सुनना, बोलना बंद कर देता है और अच्छी भावना को बहाता है तो आगे वाले के मन में वहीं भाव बहना शुरू हो जाता है। अच्छी भावना के साथ विष को पिलाना भी अमृत बन जाता है। जो आप मानोगे, सोचेंगे वैसे आप बन जाओगे। अगर हमारे जीवन को अच्छा बनाना चाहते हम सबके साथ अच्छा भाव बनाएं। जैसे हम गांधी जी की तस्वीर देखते हैं हमारे मन में भी अच्छे भाव आते हैं। तस्वीर भावनाओं को काफी प्रभावित करते हैं। मंगल भावना से खुद को भरकर जब-जब आप मंगल करोगे तो किसी के प्रति अमंगल करना छोड़ देंगे। भाव बुरा हो तो मीठा रसगुल्ला भी कड़वा लगता है और मन में प्रेम है तो कड़वा भी मीठा लगता है। यह सिर्फ उन भावनाओं का कमाल है। जब तुम किसी के प्रति मंगल की भावना करोगे तो सामने वाले के मन में भी मंगल की भवन आ जायेगी। वह भी जाने अनजाने तुम्हारे प्रति मंगल की भाव सोचेगा। हम जब एक दूसरे को राम-राम या जय जिनेंद्र बोलते हैं तो हम सामने वालों को भी एक जाने अनजाने में ही सही भगवान का स्मरण करने का मौका दे देते हैं। मन जल्दी झुकने को राजी नहीं होता और जो सही में झुकता है वह किसी के बारे में गलत नहीं सोच सकता। जो अकड़ है वही गलत सोच पैदा करता है। जब हम अच्छी भावना बांटते हैं तो हमारी अच्छी चीज भी बाहर आ जाती है। जब हम बुरे लोगों के बीच जीते हैं तो बुरी भावनाएं बाहर आ जाती है। जो नहीं करने की सोचते हैं वह भी कर देते हैं और अच्छा हिस्सा दब जाता है। हृदय से नमस्कार कर आगे वालों को मानो कि वह भगवान है। सभी आत्माएं भगवान हैं। सभी को समझइए कि वे भावी के भगवान हैं। हममें किसी के प्रति दुर्भावना तब आती है जब हमें भगवान नहीं दिखते, हमें शैतान दिखता है। इसलिए हमें दृष्टि पर काम करना है । हमें दूसरों के लिए नहीं खुद के लिए करना है। मुझे आंखों से भी किसी के बारे में बुरा नहीं सोचना है। जगत एक दर्पण है हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बाहर हमें दिखाई देता है। हमारे संपर्क में दो ही आते हैं जड़ जगत और चेतन जगत। हमें दोनों के प्रति अच्छी भावना रखनी होगी। आहार में दुर्भावना मिले तो वह जहर भी बन जाता है। ऐसे भी उदाहरण है की भावनाओं के कारण लोगों की ग्राहकी बढ़ जाती है। अच्छे भाव अपना असर करती है। आप जो दूसरों से शिकायत करते हो एक बार खुद पर झांक कर देखिए कि आप भी तो वैसी हो। आप खुद को समय दीजिए। हम अपने साथ जो व्यवहार करते हैं वैसा ही व्यवहार हमें दूसरों के व्यवहार अपने प्रति नजर आता है। जैसे लोग कहते हैं कि मेरी कोई कदर नहीं करता है लेकिन आप अंदर झांक देखेंगे तो आप खुद के कद्र करते हैं या नहीं? मैंने देखा है कि कई लोग अपना ही कद्र नहीं करते हैं। आपकी जितनी शिकायतें हैं लिख डालिए। मेरे साथ तो अच्छा व्यवहार नहीं करता, पर आप दिन भर में अपने साथ अच्छा व्यवहार क्या करते हैं या नहीं? यह जांच करें. जो भी गलत दूसरों के प्रति सोच रहे हैं वह आपको उसके साथ तो नहीं कर रहे हैं इस बात का ध्यान रखें। आप अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं या नहीं, कोई मुझे प्रेम नहीं करता तो आप स्वयं से प्रेम करते हैं कि नहीं? जब आप स्वयं से प्रेम करते हैं तो पूरा जगत आपसे प्रेम करने लगेगा। जब भगवान ने स्वयं को सुधारा तो उनके करोड़ों मंदिर आज बन रहे हैं। लोगों में उनके प्रति सम्मान जगा हुआ है। उन्होंने सभी को होमवर्क दिया कि जो भी दिखे उन्हें जय जिनेंद्र बोलना लेकिन जय जिनेंद्र शब्दों से नहीं बल्कि भाव के साथ बोलना है। बिना भाव के साथ क्रिया बदलाव नहीं ला सकती। मन में भी बोल सकते हैं। सामने वाले को भावी के भगवान मानना है ।जिसे आप दुश्मन मान रहे हैं उसे भी आप सामने आ जाए तो यही भाव से बोले। उस समय आपको दुश्मनी याद नहीं आएगी। भावी के भगवान, इस अभ्यास से आपका जीवन आनंद से भर जाएगा ।जितनी भी शिकायतें हैं रिश्तो में उन्हें लिखे और खुद के बारे में सोचे कि आप कितना पालन करते हैं । आप जल्दी उठते हैं कि नहीं, आप काम करते हैं या नहीं, आप गुस्सा करते हैं कि नहीं? इसका मतलब है कि हम ही अपनी बात नहीं मान रहे हैं। यह प्रतिक्रमण आपने करना सीख लिया तो पूरा जगत में हमें बदलाव देखने लगेगी। यह प्रतिक्रमण आपको पूरा बदल डालेगा। एक व्यक्ति जिसे आप बिल्कुल पसंद नहीं करते हैं , उनकी तीन गड़बड़ियां लिख लो और एक बार ध्यान से ढूंढो कि वह तीन गड़बड़ियां खुद में है या नहीं. वह गड़बड़ियां आप में भी मिलने लगेगी। जिस दिन आपने यह तरीका अपना लिया तो आपको किसी से शिकायत नहीं रहेगी। राम जी को रावण से कोई शिकायत नहीं थी। जब व्यक्ति को हम भगवान की तरह देखने लगते हैं तो उसके प्रति द्वेष भी नहीं रख पाते हैं सिर्फ प्रेम रहता है। इसलिए हमें प्रेम को बढ़ाना है। आज हमें हमसे प्रेम करना है अपनों से करना है और दूसरों से भी। जब हम दिन भर प्रेम बांटना शुरू करेंगे तो सबका मंगल सोचा करेंगे तभी यह संभव होगा।

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