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24 अगस्त को गुरुर में विधिविधान से विराजेंगे भगवान पशुपतिनाथ : काल भैरव देउर मंदिर में होगी भव्य प्राणप्रतिष्ठा समारोह,21 को जल कलश यात्रा

हर-हर महादेव की जय गूंज के साथ 21अगस्त से 24 अगस्त तक होंगे प्राणप्रतिष्ठा के विभिन्न आयोजन,नगर के धर्मप्रेमियों में भारी उत्साह

1लाख बाती से होगी भगवान पशुपतिनाथ की विशेष आरती

गुरुर। नगर के काल भैरव देऊर मंदिर में भगवान पशुपतिनाथ की 24 अगस्त को भव्य प्राणप्रतिष्ठा करने की तैयारी जोर शोर से चल रही है। सावन के महीने में शिवभक्तों के लिए यह बड़ी खुशखबरी है। भगवान पशुपतिनाथ जी के प्राणप्रतिष्ठा का यह विधिविधान समारोह तीन दिनों तक चलेगा। मंदिर के आचार्य पंडित सुरेश पांडेय ने कार्यक्रम की विस्तार पूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि 21अगस्त को अंचल के समस्त शिवभक्तों द्वारा जल कलश यात्रा निकाली जाएगी,यह जलकलश यात्रा देउर मंदिर से गणेशा तालाब कोलिहामार तक निकाली जाएगी जिसमे सभी शिवभक्त शामिल हो सकते हैं। उसी दिन भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिमा का अन्नाधिवास भी सम्पन्न होगा। 22 अगस्त को भगवान का महास्नान किया जाएगा। तत्पश्चात 23 अगस्त को भगवान पशुपतिनाथ का फलाधिवास एवं शैय्याधीवास किया जाएगा। ये सभी प्राणप्रतिष्ठा के पूर्व किए जाने वाले विधि विधान, नियम व पूजन है। भगवान पशुपतिनाथ जी की प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम 24 अगस्त को दोपहर 3 बजे से पूरे विधिविधान और मंत्रोच्चारण से प्रारंभ हो जाएगा। भगवान की प्राणप्रतिष्ठा पूजन सम्पन्न होने के बाद भगवान का श्रृंगार और आरती किया जाएगा। भगवान की भव्य आरती इस बार आकर्षण का केंद्र रहेगी क्योंकि नगर में पहली बार लाखर बाती(1 लाख बाती के दीप) से भगवान की भव्य आरती की जाएगी। जिसका संकल्प नगर के एक शिवभक्त शर्मा परिवार द्वारा किया गया है। मंदिर आचार्य पंडित सुरेश पांडेय ने बताया कि काल भैरव देऊर मंदिर में पूरे सावन भर रुद्राभिषेक किया जा रहा है। तथा
22 अगस्त से 25 अगस्त तंक शिवमहापुराण की कथा प्रवचन भी दोपहर 3 से 5 के बीच किया जा रहा है। जिसमे अंचल के धर्मप्रेमी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। मंदिर समिति के समस्त सदस्यों ने अंचल के समस्त धर्मप्रेमियों को उपरोक्त कार्यक्रमो में सम्मलित होने की अपील की है और भगवान पशुपतिनाथ जी के प्राणप्रतिष्ठा समारोह हेतु सबको आमंत्रित किया गया है।

मौलिक रूप में दीमक द्वारा आच्छादित शिवलिंग है मंदिर की विशेषता

देऊर मंदिर में स्थापित शिवलिंग का स्वरूप अपने आप में विशेष है। इस प्राचीन मंदिर में शिवलिंग अपने मौलिक रूप में विद्यमान है। खास बात है कि शिवलिंग यहां गर्भगृह में दृष्टिगोचर नहीं है। ऐसा माना जाता है की यहां शिवलिंग भूतल से 5 फीट नीचे गहराई में स्थापित है और बाहरी तौर पर पूरा शिवलिंग दीमक द्वारा आच्छादित नजर आता है। दीमक के घर को स्थानीय भाषा में भूड़ू भी कहा जाता है और प्रचलित रूप में देऊर मंदिर में विराजमान भगवान शिव को भूड़ू वाले बाबा भी कहा जाता है।

द्रविड़ शैली के स्थापत्य और पिरामिड नुमा शिखर से निर्मित है ऐतिहासिक भूड़ू वाले बाबा का मंदिर

देऊर मंदिर का निर्माण द्रविड़ शैली की स्थापत्य कला के अनुरूप किया गया है। यहां गर्भ गृह में पिरामिड नुमा शिखर है, जिसमें श्री यंत्र निर्मित है। मंदिर के आचार्य सुरेश पांडे ने बताया की यह ऐतिहासिक मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण के विषय में दो मान्यताएं प्रचलित हैं। यह कहा जाता है कि कलचुरी शासकों द्वारा सातवीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया गया। वहीं नागवंशी शासकों द्वारा 12वीं शताब्दी में इस मंदिर को बनवाया गया है,ऐसा भी माना जाता है। मंदिर के पीछे के हिस्से में एक प्राचीन शिलालेख भी है जो गोंडी भाषा में है।

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