सामाजिक बुराइयों पर अंकुश के साथ जैविक खेती को दे रहीं बढ़ावा, 10 गांवों की महिलाएं कर रही हैं जीमीकांदा की खेती
बालोद। सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता फैलाने और शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचाने के लिए गठित सामाजिक महिला कमांडो अब खेती-किसानी के क्षेत्र में भी मिसाल पेश कर रही हैं। जिले के विभिन्न गांवों की महिला कमांडो इन दिनों जीमीकांदा (सूरन) की खेती कर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। इस पहल से महिलाओं को अतिरिक्त आय के साथ-साथ पारंपरिक कृषि को बढ़ावा भी मिल रहा है।
पद्मश्री शमशाद बेगम ने बताया कि सामाजिक महिला कमांडो का गठन सेवा भावना, सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन और जनहितकारी योजनाओं को आमजन तक पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है। ये स्वयंसेवी महिलाएं रात्रि गश्त कर गांवों में शराब, जुआ और असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने का कार्य करती हैं। अब इन्हीं महिला कमांडो को स्वरोजगार और खेती से जोड़ने के लिए जीमीकांदा की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में करीब 10 गांवों की महिला कमांडो इस खेती से जुड़ी हुई हैं। भविष्य में महिलाओं को आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण देकर कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर आय के लिए प्रेरित किया जाएगा।
जेवरतला की महिला कमांडो सुशीला साहू ने बताया कि उन्होंने अपने घर की बाड़ी में लगभग 60 जीमीकांदा के पौधे लगाए हैं। इससे परिवार के उपयोग के साथ-साथ बाजार में बिक्री कर अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो रही है।
वहीं तीजन साहू ने बताया कि क्षेत्र की अधिकांश महिला कमांडो जीमीकांदा की खेती कर रही हैं और बाजार में इसकी अच्छी मांग होने के कारण महिलाओं को आर्थिक लाभ भी मिल रहा है।
जीमीकांदा की खेती से जुड़ी महिला कमांडो में सुशीला साहू, प्रभा साहू, सावित्री, ननकी साहू (जेवरतला), झमित साहू (अरजपुरी), हेमलता साहू (बोरी कसही), गंगा साहू (सिंगापुर), पुष्पा देशमुख, एवन देशमुख, सुनीता, वेद कुमारी, सुनती, मुन्नी, सुमरित, मंगतीन (जोगीभाठ), तीजन, टेमेश्वरी, उत्तरा, जानकी, बिसंतीन, सुभोतीन, बुन्देली, सरस्वती साहू, खेमीन साहू (बोरी), मनभा यादव (अन्नूटोला), सावित्री साहू, हिरमा साहू (खैरवही), वीना ठाकुर, भानबाई एवं देवकुमारी (परसदा सांकरा) सहित अनेक महिलाएं शामिल हैं।
महिला कमांडो की यह पहल सामाजिक सेवा के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण का भी उत्कृष्ट उदाहरण बन रही है। इससे ग्रामीण महिलाओं में स्वरोजगार की भावना मजबूत हो रही है और खेती के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में नया रास्ता खुल रहा है।










