फल के राजा आमा आगे, लइका मन चुहुकन लागे।
आँधी खातिर डार लहसगे, बिक्कट आम गिरन लागे।।
हफटत गिरत दौड़त भागे, बोरी भर लादन लागे।
गाँव शहर मा चिल्ला के अब, चुस्की ला बेचन लागे ।।
चटनी बर आमा बेचावत, छाँट-छाँट लेवन लागे।
मिरचा हरदी कूर मसाला, घर भर अब महकन लागे।।
गरती आमा सस्ता होगे, किलो-किलो लेवन लागे।
कोई एखर जूस बना के, कोई हा चूसन लागे।।
अबड़ गुड़ाम बनावय नानी, नाती मन खावन लागे।
नैहर घर बर जोरत हाबे, प्रेम भाव बाढ़न लागे।।
आमा के घलो खोइला बर, हँसिया धर छोलन लागे।
पर्रा-पर्रा भर भौजी हा, छत मा सूखावन लागे।।
मामी आमा ला सूखा के, आमचूर जोरन लागे।
मामा घर के आमा भाई, अब सबला भावन लागे।।
धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री
बालोद
