हरबोला संप्रदाय का स्तुति गान का अनूठा रिवाज अब विलुप्ति की कगार पर, पेड़ो पर चढ़ बस्ती को 5 बजे जगाते हैं ये हरबोले



बालोद। बचपन में आपने कविता सुनी होगी बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी है,,, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी है,,,, इन पंक्तियों में आने वाले हरबोलो के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। आज भी यह हरबोले गांव में जाकर लोगों को दान धर्म की शिक्षा देते हैं। गांव की रक्षा के लिए शंख बजाते हैं। सूर्य उदय होने से पहले ही गांव के बरगद, नीम या पीपल के पेड़ पर चढ़कर यह आवाज लगाते हैं। कबीर के दोहे सहित दिन धर्म की बातें लोगों को बताते हैं। उनकी आवाज सुनकर लोग जाग उठते हैं और दान धर्म के लिए चल पड़ते हैं। अपनी इच्छा अनुसार लोग इन्हें दान करते हैं। रोचकता यह है कि बिना दान शुरू हुए यह हरबोले महाराज पेड़ से उतरने नहीं है। ऐसा ही एक दृश्य बालोद जिले के जगन्नाथपुर में देखने को मिला। जहां बीते दिनों सुबह 5 बजे से ही गांव में पहुंचे तीन हरबोले महाराज अलग-अलग जगह पर पेड़ों पर चढ़कर आवाज देने लगे। लोगों ने अपने श्रद्धा भक्ति के साथ उन्हें दान किया। हालांकि पहले की तरह अब यह परंपरा विलुप्त हो रही है। लोगों में भी इन हरि बोल महाराज के प्रति जागरूकता और जुड़ाव कम होते जा रहा है। जिससे बदलते दौर में लोग अब इन्हें दान धर्म करने के लिए आगे नहीं आते।

बुंदेलखंड से है हमारे पूर्वज, कवर्धा क्षेत्र से आते हैं, पूरे छत्तीसगढ़ के गांवों में जाते हैं

हरि बोल महाराज संजय गोस्वामी ने बताया कि हमारे पूर्वज बुंदेलखंड से ताल्लुक रखते हैं। यह हमारी चौथी पीढ़ी है जो इस प्रथा का पालन कर रहे हैं। पर आज की शिक्षित पीढ़ी इन बातों को नहीं मानती है और हमें दान के लिए आगे नहीं आते हैं। एक वक्त होता था जब हरबोले सुबह 5 बजे पेड़ों पर चढ़कर आवाज लगाते थे तो पूरा गांव दान धर्म के लिए इकट्ठा हो जाता था। सूर्योदय होने से पहले पूरा दान हो जाता था। पर आज सूर्यउदय होने के बाद गिने-चुने लोग दान करने के लिए पहुंचते हैं। जो पुराने सियान,बुजुर्ग हैं वहीं हरबोलो का महत्व समझते हैं। पर आज की नई पीढ़ी हमें सिर्फ भिक्षा मांगने वाले समझकर मजाक उड़ाया करते हैं। पर ऐसा नहीं है। दीपावली मनाने के बाद लगातार 4 महीने हम कवर्धा क्षेत्र से छत्तीसगढ़ के विभिन्न गांव में जाकर इसी तरह से गांव की खुशहाली की कामना के साथ पेड़ों पर चढ़कर स्तुति करते हैं। गांव की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। लोगों को दीपक जलाकर दान करने के लिए प्रेरित करते हैं। चावल के बजाय लोगों को हम धान दान करने के लिए बताते हैं। क्योंकि धान का दान सबसे विशेष माना गया है।

बदल रहा है दौर, मान सम्मान में भी हो रही है कमी

हरबोले संजय गोस्वामी ने कहा कि आज हमारे प्रति लोगों के बीच मान सम्मान कम हो रहा है। पहले एक आवाज लगाने पर पूरा बस्ती जाग उठता था और सुबह होने से पहले 1 घंटे के अंदर दान धर्म का कार्य हो जाता था। पर अब दौर बदल चुका है। लोग इस प्रथा में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं। हमारे आने वाली पीढ़ी भी इस प्रथा को आगे बढ़ा पाएगी या नहीं, कह नहीं सकते। मैं अपने परिवार में चौथी पीढ़ी से हूं जो इस प्रथा को अपना कर चल रहा हूं। लोगों को हम सीख देते हैं कि धर्म के राह पर चलो। उन्होंने कहा कि हम कोई भी हरा पेड़ खासकर बरगद, पीपल और नीम के पेड़ों पर चढ़कर इसी तरह से सूर्योदय से पहले हम विभिन्न मंत्रों की स्तुति को गाकर गांव की रक्षा और खुशहाली की कामना करते हैं। साथ ही दान करने वालों के लिए भी हम स्तुति गान करते हैं।

राजा, रानी की गाथा गाकर करते थे एक जमाने में गुजारा

ज्ञात हो कि एक जमाने में अपनी अनूठी शैली और अलग आवाज में राजा, रानी, महाराजाओं और वीरों की गाथा यही हरबोले सुनाते थे। पर आज मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में इन हरबोलों को अब कोई सुनने वाला नहीं है। इनकी परम्परा और लोक गायन विलुप्त होने की कगार पर है। हरबोला अलसुबह पेड़ों पर चढ़कर कबीर, तुलसीदास के दोहे गा रहे हैं. पराक्रमी राजाओं की वीर गाथाएं और भगवान राम का गुणगान कर रहे हैं, लेकिन इस लोक कला के अब श्रोता नहीं रहे। इन लोक गायकों को मान सम्मान अब नहीं मिलता, जो पहले दिया जाता था. आज की पीढ़ी अब इनको पहचानती नहीं है।

कबीर-तुलसी के दोहे गाकर जागरूक करते हैं हरबोले

शंकर हरबोला ने बताया कि हमारी पीढ़ियां राजा, महाराजा के जमाने से बोलते आ रही हैं, अब कोई इतनी पहचान नहीं रखता और नहीं पहचानता. घूम फिर कर अपने पेट का गुजारा कर लेते हैं. हम राजाओं के वंशज हैं. इतिहास में हमारा भी नाम चलता था. वीरों की गाथाएं गाते हैं. कबीर, तुलसी, मीरा के दोहे गाकर लोगों को जागरूक करते हैं, पहले हमें लोग जानते थे, सम्मान देते थे. अब हमें कोई नहीं पहचानता। उन्होंने बताया कि एक ऐसा भी दौर था जब हम पेड़ पर चढ़कर गाथाएं गाते थे तो लोग मनाकर उतारते थे और मान-मुनव्वल करते थे. अनाज और पैसा देते थे. अब पेड़ से उतारने कोई नहीं आता. कुछ हरबोले तो गलियों में फेरी लगाकर पेट पालने को मजबूर हैं।

मांगने वाला समझते हैं, सम्मान नहीं मिलता

बदलते दौर में अब लोग हरबोलों को नहीं जानते, उनका क्या इतिहास है यह नई पीढ़ी को नहीं पता. इसलिए हरबोला संप्रदाय के युवा इस काम को अब नहीं करते. जीवन यापन के लिए वे अन्य काम करते हैं। जिनके पास खेती बाड़ी है या फिर काम है वह यह नहीं करते हैं. अब यहां कोई सम्मान नहीं करता. लोग समझते हैं कि कोई मांगने, खाने वाला आया है. पहले हमें सम्मान मिलता था.

सोई हुई बस्ती को जगाते हैं

अपना दर्द बयां करते हुए संजय गोस्वामी हरबोला बताते हैं कि सोई हुई बस्ती को सुबह 5 बजे से हम जगाते हैं, और लोगों को बताते हैं कि आज भी है हरि का हरबोला. नगर सहित गांव के लोगों को जगाते हैं. पर वर्षों पुरानी यह परंपरा अब दम तोड़ती हुई दिखाई दे रही है.

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