DAILY BALOD NEWS

EDITOR IN CHIEF – DEEPAK YADAV.9755235270

Advertisement

हरदेलाल के मंदिर में लोगों ने चढ़ाया आस्था के प्रतीक 490 मिट्टी के घोड़े, मनाया अनूठा देवदशहरा

बालोद। बालोद से करीब 35 किमी दूर ग्राम डेंगरापार (घीना) के हरदेलाल मंदिर में 7 अक्टूबर मंगलवार को देव दशहरा पर्व मनाया गया। इस अवसर पर हजारों की भीड़ जुटी। इस मंदिर परिसर में हर साल नवरात्रि के बाद आने वाले मंगलवार को ग्रामीण यहां आकर हरदेलाल को मिट्टी से बने घोड़े की प्रतिमा अर्पित करते है। इस मौके पर अपनी मनोकामना पूरी होने पर सैकड़ो लोग मिट्टी के घोड़ा चढ़ाने के लिए पहुंचते हैं। मंगलवार को देर शाम तक घोड़ा चढ़ाने के लिए लोगों की कतार लगी रही। ग्रामीणों की मान्यता है कि मिट्टी के बने घोड़े चढ़ाने से हरदे लाल उनकी मनोकामना पूरी करते हैं। हर साल 300 से 500 प्रतिमा यहां चढ़ाए जाते हैं। इस साल 490 घोड़े चढ़ाए गए। इस क्षेत्र के ग्रामीणों ने हरदेलाल को भगवान का दर्जा दिया है। मन्नत पूरी होने के बाद ही वे देव दशहरा को मिट्टी का घोड़ा लेकर हरदेलाल को भेंट करने पहुंचते हैं। घोड़ा चढ़ाने के लिए डेंगरापार अ., नवागांव, घीना, कसहीकला, गड़ईनडीह, लासाटोला गांव से सेवा गाते हुए डांग डोरी लेकर रैली के रूप ग्रामीण मंदिर पहुंचते हैं। जहां देव दशहरा पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। हरदेलाल को समर्पित सेवा और जस गीत गाते हुए पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ श्रद्धालु मंदिर तक आते हैं। वहीं मिट्टी का घोड़ा चढ़ाने वाले लोग उसे टोकरी सहित सिर पर रखकर आते हैं। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मन्नत पूरी होने पर यहां लोग दोबारा आते हैं।

महिलाओं का प्रवेश वर्जित

महिलाओं का मूल मंदिर में प्रवेश वर्जित है। महिलाओं का प्रसाद भी खाना वर्जित होता है। यदि कोई गर्भवती है तो उसके पति को भी प्रसाद खाने की मनाही होती है। डेंगरापार में अलग से दशहरा नहीं मनाया जाता, न ही रावण मारा जाता है। बताया गया कि इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

घोड़ा चढ़ाने की परंपरा 110 साल पुरानी

ग्रामीण तामेश्वर सिन्हा, रूपसिंह रावटे ,संजय साहू ने बताया कि करीब 110 साल से यह परंपरा चली आ रही है। जब से होश संभाले हैं, तब से हरदेलाल बाबा के मंदिर में मिट्टी का घोड़ा चढ़ाने वालों को देख रहे हैं। अब तक हजारों की संख्या में श्रद्धालु मिट्टी के घोड़े चढ़ा चुके हैं।

घोड़े की सवारी कर आए थे हरदेलाल

घीना के समाज सेवी डालचंद जैन का कहना है कि पूर्वजों से एक दंतकथा सुनते आए हैं कि हरदेलाल घोड़े में सवार होकर यहां आए थे और लोगों का दुख-दूर करते थे। उनके समय के लोगों ने उन्हें देवता स्वरूप मान लिया। करीब 90 साल पहले जब घीना बांध बना तब लोगों ने हरदेलाल का मंदिर बनवा दिया।

नहीं मारते डेंगरापार में रावण

हरदेलाल के प्रति ग्रामीणों में ऐसी श्रद्धा है कि वे लोग मूल दशहरा पर्व न मनाकर देव दशहरा ही मनाते हैं। इसी मान्यता के चलते अलग से दशहरा में जिस तरह अन्य गांव में रावण का पुतला दहन करते हुए उत्सव मनाते हैं ऐसा कुछ भी इस गांव में नहीं होता।

देव दशहरा मेला पर घीना में हुआ चिखली का नाच

देव दशहरा मेला पर आसपास के बड़े गांव में सांस्कृतिक और नाच का कार्यक्रम होता है। इसी क्रम में ग्राम घीना में रात्रि में जय माँ शीतला माँ के ममता नाच पार्टी ग्राम चिखली (बाधा बाजार) का कार्यक्रम रखा गया था।

You cannot copy content of this page