बालोद नगर पालिका में पारदर्शिता पर सवाल: RTI में जानकारी न देने पर राज्य सूचना आयोग में अपील



बालोद, 02 फरवरी 2026: नगर पालिका परिषद बालोद पर पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक गंभीर मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुँच गया है। उमेश कुमार सेन, निवासी वार्ड क्रमांक 7, काशी बाना तालाब, पांडे पारा, बालोद ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी न मिलने पर द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग, छत्तीसगढ़ में दायर की है।
यह मामला शीतला मंदिर गंगासागर तालाब, बालोद के सौंदर्यीकरण, रख-रखाव, टेंडर प्रक्रिया, व्यय विवरण और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) से जुड़ा हुआ है। अपीलकर्ता ने कहा कि यह पूरे विषय में पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही से संबंधित है।

कानूनी पृष्ठभूमि:

उमेश कुमार सेन ने 21 नवंबर 2025 को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(1) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया था। 30 दिनों में जानकारी उपलब्ध न कराए जाने पर 26 दिसंबर 2025 को प्रथम अपील दायर की गई। 23 जनवरी 2026 को सुनवाई हुई, लेकिन अपीलीय प्राधिकारी अनुपस्थित रहे और कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया। केवल मौखिक रूप से कहा गया कि “जानकारियाँ अलग-अलग विषय की हैं।” अपीलकर्ता ने स्पष्ट किया कि सभी मांगी गई जानकारियाँ एक ही परियोजना से संबंधित हैं।

मुख्य आरोप:

जन सूचना अधिकारी द्वारा 30 दिनों में उत्तर न देना — धारा 7(1) का उल्लंघन।
प्रथम अपीलीय प्राधिकारी द्वारा सुनवाई में अनुपस्थिति — धारा 19(6) का उल्लंघन।
जानकारी जानबूझकर रोके जाने का आरोप — धारा 20(1) के अंतर्गत दंडनीय अपराध।
अपीलीय प्राधिकारी की लापरवाही — धारा 20(2) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई योग्य।

अपीलकर्ता का कथन:

उमेश कुमार सेन ने कहा, “नगर पालिका परिषद बालोद लगातार सूचना से बचने का प्रयास कर रही है। जब जानकारी एक ही परियोजना से जुड़ी है, तब उसे अलग-अलग आवेदन बताना कानून की अवहेलना है। मैं गरीब वर्ग (BPL) से संबंधित हूँ, फिर भी निःशुल्क सूचना न देकर मेरे अधिकारों का हनन किया गया। यह पारदर्शिता और जनहित के खिलाफ है।”जानकारी वर्ष 1995 से 2025-26 तक की मांगी गई थी। उद्देश्य यह था कि बीते 30 वर्षों में एक तालाब के सौंदर्यीकरण, गहरीकरण व अन्य कार्यों के नाम पर कुल कितनी राशि खर्च की गई और उससे आम जनता को वास्तविक रूप से क्या लाभ मिला।उमेश सेन ने बताया कि निर्धारित समय-सीमा के भीतर बार-बार आवेदन और अपील के बावजूद संबंधित विभाग द्वारा पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई, जो सूचना के अधिकार अधिनियम का स्पष्ट उल्लंघन है। इसी कारण मामला अब राज्य सूचना आयोग तक पहुंच गया है।

राज्य सूचना आयोग से मांग:

जन सूचना अधिकारी को निर्देशित किया जाए कि 15 दिन में पूर्ण सूचना उपलब्ध कराएँ।
धारा 20(1) के तहत ₹25,000 तक का दंड लगाया जाए।
अपीलीय प्राधिकारी की लापरवाही पर धारा 20(2) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
आयोग स्वयं रिकॉर्ड निरीक्षण (Record Inspection) का आदेश दे।
भविष्य में नागरिकों को भटकाने से रोकने हेतु विशेष दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ।

जनहित का संदेश:

यह मामला केवल तालाब या मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि क्या नगर पालिका परिषद जैसी संस्थाएँ जनता के पैसों से किए गए कार्यों में पारदर्शिता और जिम्मेदारी निभा रही हैं। सूचना का अधिकार जनता को “जानने का अधिकार” देता है, और जब यह रोका जाता है तो लोकतंत्र की आत्मा पर चोट पहुँचती है।

समाज में संदेश:

सजग नागरिक और कानून का सहारा लेने वाले लोग प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं। उमेश कुमार सेन जैसे नागरिकों के प्रयासों से भविष्य में बालोद जिला प्रशासन के विभिन्न विभागों — नगर पालिका, शिक्षा, स्वास्थ्य और वन विभाग — में पारदर्शिता की नई परंपरा स्थापित होने की उम्मीद है।

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