नवरात्रि विशेष : निपानी में है बैगिन गुड़ी दाई का विशेष मंदिर, लोग मानते हैं इन्हें गांव का रक्षक



ईश्वर लाल गजेंद्र ( संवाददाता) बालोद। नवरात्र के पांचवें दिन हम बालोद जिले के गौरव ग्राम निपानी में स्थित बैगिन गुड़ी दाई के मंदिर और यहां से जुड़ी लोगों की आस्था के बारे में रोचक कहानी लेकर आए हैं। निपानी ही नहीं, आसपास के 6 से 7 गांव के लोगों के लिए यह विशेष स्थल है। लोग इस बैगिन गुड़ी दाई को अपने गांव का रक्षक मानते हैं। इसके पीछे लगभग 200 साल पुरानी कहानी भी सुनने को मिलती है, जिसे लोग सच्ची घटना बताते हुए गुड़ी से जुड़ी कहानी को मंदिर वालों ने एक पुस्तिका छपवाकर सहेज कर भी रखा है। जिसमें बताया गया है कि करीब 200 साल पहले रायपुर में फैली हैजा के प्रकोप को किस तरह भक्तिन के चमत्कार से भगत ने दूर किया और फिर दोनों कैसे निपानी गांव तक पहुंचे और आसपास गांव के रक्षक बने। इन सब के पीछे लोगों की विशेष मान्यता और आस्था ही जुड़ी है। आज भी उनकी आगे की पीढ़ी इस मंदिर में पूजा पाठ करती है।

बस्तर क्षेत्र से आए थे भगत और भक्तिन

ग्रामीणों ने बताया करीब 200 वर्ष पूर्व बस्तर जिला के ग्राम-उरपोटी, कांदली एव नॉगरी में गोड़ मालगुजार रहते थे। वहाँ गोड़ परिवार गुजर बसर कर रहा था। इसी बीच भक्तिन भगत जंगल गये थे। तुमा, छटियारा जंगल में हवा के रुप में (भक्तिन) माता विराजमान हो गये, भगत अचानक भक्तिन को देखकर डर गये। उसके बाद भक्तिन को उरपोटी ग्राम ले गये, वहाँ जाने के बाद झाड़ फूंक कराने के लिए बैगा को बुलाया। भक्तिन को बैगा ने कहा कि, इसे कुछ बाहरी हवा नहीं है। इस पर देवी शक्ति विराजमान है। तब भगत ने कहा हम कइसे जानबो? उसी रात्रि को भक्तिन को एक स्वप्न आया, सुबह भगत को भक्तिन ने बताया कि, रात्रि में चार देवी (पार्वती, कंकालीन, माता, लोहाझार साक्षात आये और मुझे कहने लगे कि, तुम यदि मुझे मानोगे तो तुम्हारे ऊपर कोई विपत्ति नहीं आने देंगे। भक्तिन के विचार से सहमत होकर भगत ने देवी को मानने के लिए तैयार हो गये। कुछ दिन बाद एक परिवार थनवार के पुत्र दुड़र्चु, जिनके तीन पुत्र जगत, गौर सिंह, भगत के पुत्र हरिराम ये सब मुजगहन (धमतरी) आ आये और भगत भक्तिन करकाभाट में आ गये और वहीं निवास करने लगे । वहाँ उनके पास बहुत दीन-दुखी आ करके झाड़-फूंक करवा कर ठीक हो जाते थे । करकाभाट से लगा ग्राम-करहीभदर जो अंचल का बहुत प्रसिद्ध बाजार एवं मवेशी बाजार के नाम से प्रसिद्ध है। जहां आये दिन कई प्रकार का होनी अनहोनी घटना घटित हो रहा था । जिसके कारण गाँव वाले बहुत परेशान थे।

भक्तिन के शक्ति से गांव को सुधारने का काम करते थे भगत

करहीभदर वालों ने ग्राम करकाभाट से भगत को गाँव जो बिगड़ा है उसे सुधारने बुलाया। उसी समय भक्तिन ने भगत जी को ग्राम-करहीभदर जाने से काफी मना किया। मगर भगत जी तो निःस्वार्थ सेवी थे, भक्तिन की बात को न मानकर जनसेवा के हित में करहीभदर चले गए। वहाँ जाकर भगत जी ने पता लगाया कि गांव बिगड़ने के पीछे गांव की एक महिला और उनकी बेटी है। उन्होंने गांव सुधारने उपाय किए।

रायपुर में फैला था हैजा, फूंक मार भगत ने दूर की बीमारी

इसी बीच रायपुर शहर में धूंकी (हैजा) फैल गया । पूरा रायपुर शहर में हजारों आदमी काल के मुँह में समा गये । पूरा रायपुर शहर में हाहाकार मच गया। तब किसी को पता चला कि ग्राम-करकाभाट से एक भगत-रायपुर जेल में बंद है। तब वहाँ रायपुर प्रमुख ने जेल अधिकारियों से आ करके भगत जी को जेल से छोड़ने का आग्रह किया एवं भगत जी से भी कहा कि शहर जो बिगड़ा हुआ है, उसे बना दो । तब जेलर भगत जी से पूछता है कि, क्या रायपुर शहर बिगड़ा हुआ है, उसे तुम बना सकते हो । तब भगत बोला मैं का बनाहूँ, बनाने वाला तो वही भक्तिन और भगत हावे, यह कह करके मंत्र से एक फूंक मारा तो सारा रायपुर शहर उल्लास में डूब गया। कुछ ही समय में रायपुर का धूंकी (हैजा) बंद हो गया।

चमत्कार देख, जेल प्रबंधन ने दिया था बैगा गुनियाई से इलाज करने का प्रमाण पत्र

उनके चमत्कार देख जेल प्रबंधन द्वारा उन्हें बैगाई से इलाज करने का प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानपूर्वक रायपुर से बिदाई दे दी गई। तत्पश्चात् भगत जी जेल से छूटने के बाद पुनः करकाभाट आया । लेकिन वहाँ उनका मन नहीं लगा और वह वहाँ से ग्राम-निपानी (बालोद) आ गया । कुछ दिन बाद भक्तिन को प्रथम संतान की प्राप्ति हुई। जिसका नाम अमर सिंह रखा गया। भगत जी ग्राम-निपानी में रहते हुए ग्राम-सोंहपुर, गोड़री, नागाडबरी, तमोरा, सुर्रा आदि ग्रामों में बैगा का काम करते थे । जब तक वह इन गाँवों में बैगा का काम करते थे, तब तक इन गाँवों में किसी भी प्रकार की कोई बिमारी जैसे धूंकी, हैजा, कालरा आदि नहीं आया ।समयोपरान्त भगत, भक्तिन की उम्र ढलने लगी, वृद्धावस्था आ गयी।

ग्रामीणों की मान्यता, आज भी उनकी आत्मा करती है गांव की रक्षा

भगत जी का तबीयत हमेशा खराब रहने लगा। तब एक दिन भगत जी ने अपने मृत्यु को निकट जानकर ग्राम-निपानी सोंहपुर एवं गोड़ी के गणमान्य सियानों को बुलाकर कहा कि, मैं ज्यादा दिन का मेहमान नहीं हूँ। मेरी मृत्यु समीप है, इसलिए मेरे मरणोपरांत मेरे मृतक शरीर को निपानी, गोड़री और सोंहपुर के सियार में दफन कर देना और दीपावली के बाद आने वाले प्रथम सोमवार को मेरे गुड़ी में मुझे (फुलवारी) मंडाई प्रदान करना, ताकि मैं मरकर भी मेरी आत्मा हमेशा तीनों ग्रामों की रक्षा करती रहेगी। वह स्थान आज भी तीनों ग्राम के मध्य स्थित है, जिसे बईगिन बैगा गुड़ी के नाम से पचासों किलोमीटर दूर के लोग जानते हैं।

यहां का मेला होता है दूसरों से अलग

यहाँ के मेले में काफी भीड़ जुटती है। मेले में तीन देवियों का श्रृंगार किया जाता है, जिसमें लगभग 30 फीट के बांस में कंकालीन (काला कपड़ा) माता लोहाझार (सफेद कपड़ा) और पार्वती (कोसाही कपड़ा) से श्रृंगार किया जाता है, जिसे डंगनी कहते हैं। मेला पश्चात् जब डंगनी अपने मूल स्वरुप में ग्राम-निपानी के धरा पर पहुँचती है, तब दीन-दुखी लोग अपने-अपने घर के आगे डंगनी का पूजा अर्चना करते हैं। जिनकी कोई संतान नहीं होती, वह माता अपनी गोदी में नारियल लेकर डंगनी के आगे सो जाती है (परण परती है)। लोगों का मानना है कि अगर डंगनी उसके ऊपर पैर रखकर निकल गया तो समझो साल भर में उसे संतान की प्राप्ति होना ही है। यह प्रमाणित है, कोई भी दीन-दुखी भगत, भक्तिन के दरबार से निराश व खाली हाथ नहीं गया है। माँ भगत भक्तिन सबकी मनोकामना पूरा अवश्य करते हैं। इसी प्रकार होली के दिन भी फाल्गुन त्यौहार के दिन होलिका दहन में तीनों देवी अपने श्रृंगार में आकर भ्रमण करते हैं, यह आज भी विद्यमान है। ग्राम निपानी में भक्तिन भगत के आकर रहने के बाद चौथा पीढ़ी में महाजन के कार्य काल में वह प्रमाण पत्र जो सेंट्रल जेल रायपुर से मिला था, वह अचानक घर में आग लग जाने से जल गया।

नवरात्र में भी होता है विशेष आयोजन

ग्रामीणों का मानना है कि अभी भी इनके पूर्वज देव स्वरुप में भगत भक्तिन जिनके पुत्र अमर सिंह, उनके पुत्र गोवर्धन, गोवर्धन के बहन दुगदी बाई, गोवर्धन के पुत्र महाजन, धर्मपत्नि-सोनाबाई, महाजन के बहन बती बाई, महाजन के पुत्र श्रीराम, धर्मपत्नि भागबती और बहन बेना बाई अभी भी मृत आत्मा में देव स्वरुप में गुड़ी में विराजमान हैं। वहीं वर्तमान में श्री राम के तीन पुत्र और एक पुत्री स्व. कैकई बाई, प्रथम पुत्र-भांगीराम, धर्मपत्नि जामबाई, द्वितीय पुत्र नोहर सिंह, धर्मपत्नि बुधियारिन, तृतीय डोमार सिंह, धर्मपत्नि फुलेश्वरी अभी भी माँ बैगीन गुड़ी के सेवा में कार्यरत् हैं। इसी प्रकार वर्तमान में भगत भक्तिन माँ साक्षात बैगिनगुड़ी दाई मंदिर में विराजमान हैं, उसी के उपलक्ष्य में शारदीय नवरात्रि, बसन्ती नवरात्रि में माँ के ज्योति जंवारा का आयोजन बड़ी धूम-धाम से किया जाता है। यह क्रम सन् 2004 से है, इस मंदिर की उचित संचालन के लिए निपानी, गोड़री, सोंहपुर, पीपरछेड़ी, नागाडबरी, तमोरा को मिलाकर एक समिति का गठन किया गया है और समिति के माध्यम से समस्त कार्यक्रम का आयोजन होता है। दुखी जन अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु ज्योति जलाते हैं और माता उन सभी की मनोकामना पूर्ण करती है।

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