रफ्ता रफ्ता जिंदगी यूं गुजर गई,
कतरा कतरा बनके समुंदर सा थम गई।
लम्हा लम्हा यूं पिरोया जिंदगी को,
फिर भी रह गया सुना बंदगी को।
वह, वह थी जो रो-रो कर जीत जाती थी, चाहे दूर तलक हो ख्वाहिशें पास अपने लाती थी।
जाना उसने मंजिल का खूबसूरत होना जरूरी नहीं था, सफर का होना जरूरी था,
राह की खूबसूरती न सही हमराही का होना जरूरी था।
चाहती तो बहुत कुछ है पर आरजू कुछ और नहीं,
यूं तो सब अपने हैं पर वक्त आने पर कोई और कहीं कोई और नहीं।
रचनाकार : विमला (बिंदिया)रानी गंगबेर ,शासकीय प्राथमिक शाला भोथली (गुरूर)
