गांव के गणपति की देखिए रोचक कहानी: जहां नवरात्रि नहीं बल्कि गणेश चतुर्थी पर जलते हैं मनोकामना जोत,जमीन से निकली है ये मूर्ति, टीले में है विराजित



111 जोत जल रहे इस बार, परसुली गांव का ये बप्पा माने जाते हैं 450 साल पुराने

ग्रामीणों के बीच किंवदंती प्रचलित : 22 जोड़ी बैलों के जरिए लाए थे मूर्ति को गांव, सिर पर शेष नाग कारण नाम पड़ा शेष गजानंद

बालोद/ डौंडीलोहारा। जिले के डौंडीलोहारा ब्लॉक अंतर्गत आने वाले गांव परसुली ( देवरी )में स्वयंभू शेष गजानन मंदिर में गणेश उत्सव की धूम मची हुई है। इस मंदिर और मूर्ति को लेकर कई खास बातें प्रचलित है। अपनी तरह का यह एक अनूठा मंदिर है, जहां पर भगवान गणेश की स्वयंभू यानी जमीन से प्रकट हुई मूर्ति है। तो साथ ही उनके सिर के ऊपर भगवान विष्णु सदृश्य शेषनाग की आकृति भी बनी हुई है। सभी आकृति एक ही पत्थर पर है। मान्यता है कि इस मूर्ति का आकार धीरे-धीरे बढ़ रहा है। वर्तमान में इसकी ऊंचाई करीब 5 फीट है। यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि इस मंदिर में नवरात्रि की तरह लोगों द्वारा मनोकामना जोत जलाए जाते हैं। नवरात्रि में तो इस मंदिर में कोई आयोजन नहीं होता लेकिन उसकी तर्ज पर गणेश चतुर्थी को ग्रामीणों द्वारा 11 दिनों को खास तरह से मनाते हुए यहां बड़ी संख्या में मनोकामना जोत जलाए जाते हैं। सिर्फ बालोद जिला या स्थानीय ग्रामीण ही नहीं दूसरे जिले और दूसरे राज्य तक के श्रद्धालु भी यहां अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और जोत जलवाते हैं।

वर्तमान में इस गणेश चतुर्थी में यहां 111 जोत जलाए गए हैं। ग्रामीण बहुर सिंह सिन्हा, नरेंद्र साहू, कृष्णा राम प्रधान, नोहर सिंह राजपूत, संतोष कुमार साहू,पुजारी भगवानी राम इन्दौरिया ने बताया जोत जलाने वालों में राजनांदगांव, कांकेर, बलौदा बाजार, अंबागढ़ चौकी, धमतरी महासमुंद और पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से भी हैं। श्रद्धालुओं में अपनी आस्था है कि यहां मनोकामना जोत जलाने से मन की इच्छा पूरी होती है और यही वजह है कि हर साल में गणेश चतुर्थी का इंतजार करते हैं और अग्रिम पंजीयन करवा कर जोत जलवाते हैं।

बैगा के सपने में आए थे गणेश जी, 22 जोड़ी बैलों के जरिए लाया गया था मूर्ति को

गांव के लखन लाल पटेल, गौकरण लाल सोनकर, चिंता राम साहू, भाव सिंह साहू, विक्की सिन्हा,
लक्ष्मी नारायण सिन्हा ने बताया कि इस मूर्ति को ग्रामीण चमत्कारी मानते हैं। इसके पीछे एक किंवदंती चली आ रही है कि यह मूर्ति करीब 400 साल पुरानी है। हमारे पूर्वज बताते हैं कि गांव के कुछ बैगाओ के सपने में गणेश जी आए और पता चला कि परसुली, खेरथा और खैरा तीनों गांव की सरहद के पास एक मूर्ति है। जिसे गांव लाकर विराजित किया जाए बैगा के स्वप्न को आधार बनाकर सभी ग्रामीण इकट्ठे हुए और सरहद पर पहुंचे। जहां पर एक फीट से भी छोटी एक मूर्ति मिली। जिसे 22 जोड़ी बैलों के जरिए गांव तक लाया गया। गांव पहुंचने तक शाम हो गई थी एक पीपल के पास टीले के नजदीक ग्रामीण रुके और फिर गणेश जी की मूर्ति वहीं विराजित हो गई। तब से पूर्वजों द्वारा इसी किंवदंती को आगे बढ़ाया जा रहा है और आज जो करीब 450 साल पहले एक फीट से छोटी मूर्ति थी, वह अब 5 फीट का हो गया है।यशवंत कुमार साहू, सुरेश कुमार हिरवानी, डेरहा राम सिन्हा, साधु राम साहू , सर्वेश्वर राजपूत, पवन सोनकर ने बताया नवरात्रि में कोई आयोजन इस मंदिर में नहीं होते बल्कि चतुर्थी को ही विशेष तरह से मनाते हैं। लोगों में आस्था ऐसी है कि मनोकामना जोत जलाने के लिए यहां सैकड़ो लोग तैयार रहते हैं। पर जगह के अभाव में सभी के जोत जल नहीं पाते। उन्हें अगले वर्ष शामिल किया जाता है।

सिर के ऊपर शेषनाग अंकित इसलिए नाम पड़ा शेष गजानन

ग्रामीण देवेंद्र कुमार यादव,लोचन साहू, खेदूराम साहू ने बताया कि गणेश जी की मूर्ति खास है। इसमें गणेश जी की सिर के ऊपर शेषनाग की आकृति बनी हुई है। इसलिए इसे शेष गजानन के नाम से जानते हैं। बालोद जिले में यह अपनी तरह का इकलौता मंदिर माना जाता है।

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