छंद का नाम – दोहा
मांँ होती ममतामयी, सबसे रखती स्नेह।
वृक्ष छाँव शीतल मिले, हर्षित रहती देह।।
घर-आँगन सजने लगे, जहाँ पेड़ की छांँव।
प्राण वायु से मन खिले, लगे आदर्श गाँव।।
हरा-भरा हरियर दिखे, धरती माँ हर्षाय।
जीव-जंतु के शोर से, बँसी देख शर्माय।।
माँ ही जीवन दायिनी, पोषण करती नेक।
हक अपना समझा करें, खून पसीना एक।।
माँ जैसे वात्सल्यता, करुणा प्रेम अगाध।
पेड़ परमार्थ बाँटते, जड़ फल-फूल अबाध।।
मिले जड़ी-बूटी दवा, सेवन करते लोग।
सरल सहज मन योग से, रहते स्वस्थ निरोग।।
भावी पीढ़ी सोचती, गढ़ती सब पर आस।
समाधान संवाद से, सेवक रक्षक दास।।
धरती सूखी हो नहीं, मिलजुल करो उपाय।
हरियाली से भर उठे, हरियर चहुँदिशि छाय।
शासन की यह योजना, सफल करो अभियान।
एक पेड़ ही आस है, बांटे जन-जन ज्ञान।।
बीज इकट्ठा कर सदा, सड़क किनारे सींच।
जब तरुवर बढ़ने लगे, बरखा पानी खींच।।
नदी किनारे रोप लो, न खाय बकरी भेड़।
आम नीम फलदार हो, सुरम्य लगता पेड़ ।।
आँगन कानन-सा लगे, हरित वस्त्र परिधान।
मृतिका सुरभित से भरे, ताल तलैया गान।।
आज शपथ लेकर सदा, गली-खोर संदेश।
एक पेड़ माँ नाम से, सजा नगर परिवेश।।
धरा सजे श्रृंगार से, हरियर चुनरी वेश।
अनिल-सलिल भाई मिले, मेरा प्यारा देश।।
रचयिता: धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री
