तीजा में करेला खाकर रिश्तो में मिठास लाती है महिलाएं –जयंत किरी



गुरूर। नगर समाज सेवी जयंत किरी ने हरितालिका को लेकर कहा कि यह व्रत पर्व छत्तीसगढ़ी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है और यह पर्व वर्ष के प्रमुख त्योहारों में से एक है। सुहागिन माताएं बहने व बेटियां पिता बहन भतीजे आदि के लेने जाने पर ससुराल से मायके पहुंचती है। मायके में भादो सुदी दूज की शाम रात को कडू भात या करेला भात खाकर दूसरे दिन व्रत रखती है और पूजा के बाद तीसरे दिन व्रत तोड़ती है। श्री किरी ने आगे कहा कि महिलाएं ही है जो संसार की समस्त कड़वाहट को खुशी खुशी पचा लेती है। तीजा पर जी भगवान शिव की पूजा करते हैं। उन्होंने भी संसार के महाविष को पीकर अपने कंठ में रोके रखा और संसार को भस्म होने से बचाया। यह बहुत बड़ी बात है। कुछ लोग भले ही ऐसा सोचते हैं की महिलाएं तीजा पर करेला भात खाकर साल भर ससुराल में कड़वी बातें करती है । यह उनकी संकुचित सोच है। वास्तविकता तो यही है कि माताएं बहने और बेटियां ससुराल से मायके आकर कडू भात खाती जरूर है, मगर वे वर्ष भर मायके और ससुराल के रिश्तों में मिठास घोलने की दोहरी जिम्मेदारी निभाती है। और कामकाजी महिलाएं हो तो कार्यस्थल पर भी रिश्तों में मिठास घोलते हैं, यह उनकी महानता है। उन्होंने ने कहा कि शास्त्रों में भी लिखा है यत्रा नारियसतू पूज्यते तत्र रमंते देवता अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। अतः हमें नारी जाति का हमेशा सम्मान करना चाहिए जो धर्म रक्षा में पुरुषों से भी आगे हैं।

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