DAILY BALOD NEWS

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष:जरूरत है सोच बदलने की,समाज में महिलाओं की भूमिका आज भी चिंतनीय,पुरुष प्रधान समाज में महिला की योग्यता को कमतर आंका जाता है: बसंती पिकेश्वर

बालोद। अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष बातचीत में बसंती पिकेश्वर सहायक शिक्षक व उपाध्यक्ष अखिल भारतीय हल्बा आदिवासी समाज कर्मचारी प्रकोष्ठ ने विचार साझा करते हुए कहा कि हमारे समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक महिलाओं की अहम भूमिका होती है। अपनी सभी महिलाओ में निपुणता दिखाने के बावजूद आज के आधुनिक युग में महिलाएं पुरुषों से पीछे खड़ी नजर आती है। पुरुष प्रधान समाज में महिला की योग्यता को पुरुष से कमतर आंका जाता है। आज भी लोगों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है। सरकार द्वारा अनेक जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने के बावजूद महिलाओं का जीवन पुरुषों की तुलना में काफी जटिल हो गया है। अगर हम आज की महिलाओं की स्थिति की तुलना पौराणिक समाज की स्थिति से करें तो साफ नजर आता है कि स्थिति में कुछ सुधार हुआ है।
महिलाएं काम करने लगी है। घर के ख़र्च में हाथ बटाने लगी हैं। कई क्षेत्रों में तो महिलाएं पुरुषों से आगे निकल गई हैं। दिन प्रतिदिन लड़कियां ऐसे कीर्तिमान बना रही है जिन पर न सिर्फ परिवार या समाज बल्कि पूरा देश गर्व महसूस कर रहा है। सरकार भी महिलाओं की उत्थान के लिए काम कर रहा है। पिछले कुछ सालों में सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई गई है जो महिलाओं सामाजिक बेड़ियां तोड़ने में मदद कर रही हैं और साथ ही उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी कर रही हैं। पुरानी कुरीतियां को बंद करने के साथ ही सरकार ने इन पर कानूनी तौर पर रोक लगाई हैं। इनमें बाल विवाह, भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा,बाल मजदूरी, घरेलू हिंसा आदि प्रमुख थे। इन सभी पर कानूनी तौर पर रोक लगने के बाद समाज में महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार आया है। बसंती पिकेश्वर कहती है कि महिला जीवन भर खूद को अलग अलग रिश्तों में बांधकर दूसरों की भलाई के लिए काम करती है। हमने महिलाओं को बहन, मां पत्नी,बेटी,आदि कई रुपों में देखा है। शहरी इलाकों में तो स्थिति इतनी खराब नहीं है लेकिन ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है। उचित शिक्षा व्यवस्था न होने के कारण महिलाओं की स्थिति दयनी हो गई है। एक महिला एक बच्चे को जन्म देती है और जीवन भर उस बच्चे के प्रति अपनी सारी जिम्मेदारियां निभाती है। वह बदले में कुछ नहीं मांगती और धैर्य और बिना तर्क के अपनी भूमिका निभाती है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सार्थकता के प्रश्न पर वह कहती हैं आज पुरुष प्रधान समाज को जरूरत है अपनी सोच बदलने की। समाज में महिलाओं की भूमिका आज भी चिंतनीय है।

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