बालोद/ रायपुर। वर्ष 2024 में इस बार 02 सितंबर, सोमवार को पोला पिठोरा पर्व या पोला उत्सव मनाया गया। धार्मिक मान्यतानुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की इस अमावस्या तिथि को कुशग्रहणी अमावस्या भी कहते हैं। और इस दिन कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी मनाई जाती है। महाराष्ट्र या महाराष्ट्रीयन समुदाय में पिठोरी अमावस्या पर पोला/ पोळा पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह छत्तीसगढ़ का लोक पर्व भी है। इस मौके पर खासकर बच्चों ने पोला पिठोरा का आनंद लिया। प्रतिवर्ष भादों मास की पंद्रहवीं तिथि पर पिठोरी अमावस्या या पोला पिठोरा उत्सव पर मनाया जाने वाला यह पर्व मूलत: खेती-किसानी से जुड़ा त्योहार है, जो अगस्त महीने में खेती-किसानी का काम समाप्त हो जाने के बाद भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पोला त्योहार के रूप में मनाया जाता है। पोला त्योहार मनाने के पीछे यह कहावत है कि अगस्त माह में खेती-किसानी का काम समाप्त होने के बाद इसी दिन अन्न माता गर्भ धारण करती है यानी धान के पौधों में इस दिन दूध भरता है इसीलिए यह त्योहार मनाया जाता है। पिठोरी अमावस्या के दिन मिट्टी और लकड़ी से बने बैल चलाने की भी परंपरा है।
भाद्रपद कृष्ण अमावस के दिन यह पर्व खासकर महाराष्ट्र, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है। इस पोला पर्व पर बाजारों में त्योहार की खास रौनक देखी जा सकती हैं। इस दिन अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए चौसष्ठ योगिनी और पशुधन का पूजन किया जाता है। इस अवसर पर जहां घरों में बैलों की पूजा जाती हैं, वहीं तरह-तरह के पकवानों का लुत्फ भी उठाया जाता है। दरअसल, यह त्योहार कृषि आधारित पर्व है।

कैसे मनाया जाता है :
इस पर्व का मतलब वास्तव में खेती-किसानी यानि जैसे- निंदाई-रोपाई आदि का कार्य समाप्त हो जाना है, लेकिन कई बार अनियमित वर्षा के कारण ऐसा नहीं हो पाता है। और बैल किसानों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। अत: किसान इस दिन बैलों को देवतुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। यह त्योहार पुरुषों-स्त्रियों एवं बच्चों के लिए अलग-अलग महत्व रखता है।
इस दिन पुरुष पशुधन/ बैलों को सजाकर उनकी पूजा करते हैं। इसके साथ ही इस दिन ‘बैल सजाओ प्रतियोगिता’ का आयोजन किया जाता है। महिलाएं इस त्योहार पर अपने मायके जाती हैं। छोटे बच्चे मिट्टी के बैलों की पूजा करते हैं। इस दिन शहर से लेकर गांव तक पोला पर्व की धूम रहती है। इस दौरान जगह-जगह बैलों की पूजा-अर्चना होती है। पर्व के 2-3 दिन पहले से ही बाजारों में मिट्टी के बैलों की जोड़ी बिकते दिखाई देते हैं। बढ़ती महंगाई के कारण इनके दामों में भी बढ़ोतरी हो गई है। इसके अलावा मिट्टी के अन्य खिलौनों की भी भरमार बाजारों में दिखाई देती है।

पकवानों का उत्सव :
महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला लोक पर्व ‘पोला’ का नजारा देखने में बहुत ही खूबसूरत दिखाई देता है। कई समाजवासी पोला पर्व को बहुत ही उत्साहपूर्वक मनाते हैं। बैलों की जोड़ी का यह पोला उत्सव देखते ही बनता है। खासतौर पर छत्तीसगढ़ में इस लोकपर्व पर घरों में ठेठरी, खुरमी, चौसेला, खीर-पूरी जैसे कई लजीज व्यंजन बनाए जाते हैं। महाराष्ट्रीयन परिवारों में पोला पर्व के दिन घरों में खासतौर पर पूरणपोली (पूरणपोळी) और खीर बनाई जाती है। बैलों को सजाकर उनका पूजन किया जाता है, फिर उन्हें पूरणपोली और खीर भी खिलाई जाती है।
पिठोरी अमावस्या के 5 खास उपाय :
- नंदी बैल बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक तथा भगवान शिव जी वाहन माना जाता है। अत: शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इस दिन मिट्टी और लकड़ी से बने बैलों की जोड़ी लाकर घर में रखें तथा उनका पूजन करें।
- आज के दिन मंदिर के बाहर असहाय व्यक्तियों को इमरती एवं नमकीन का दान करें।
- पोला पिठोरा के दिन ब्राह्मण को काला छाता, छड़ी, काले वस्त्र, चमड़े के जूते, लोहे की वस्तु, खिचड़ी, तेल, मिठाई आदि का दान करें।
- इस दिन जितना ज्यादा हो सकें काले कुत्ते तथा बैल की सेवा करें तथा कौए व मछलियों को अन्न तथा काले घोड़े को भीगे हुए चने खिलाएं।
- पिठोरी अमावस्या के दिन भगवान भोलेनाथ का तिल के तेल से रुद्राभिषेक करें।
पर्व का उत्साह : गांव के किसान भाई सुबह से ही बैलों को नहला-धुलाकर उन्हें सजाते हैं तथा घर लाकर विधिवत उनकी पूजा-अर्चना करके घरों में बने पकवान खिलाते हैं। जिन-जिन घरों में बैल होते हैं, वे इस दिन अपने बैलों की जोड़ी को अच्छी तरह सजा-संवारकर इस दौड़ में लाते हैं। मोती मालाओं तथा रंग-बिरंगे फूलों और प्लास्टिक के डिजाइनर फूलों और अन्य आकृतियों से सजी खूबसूरत बैलों की जोड़ी हर इंसान का मन मोह लेती है। शहर के प्रमुख स्थानों से उनकी रैली निकाली जाती है। पहले कई गांवों में इस अवसर पर बैल दौड़ का भी आयोजन किया जाता था, लेकिन समय के साथ यह परपंरा अब कहीं-कहीं दिखाई पड़ती है। इस अवसर पर बैल दौड़ और बैल सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है। इसमें अधिक से अधिक किसान अपने बैलों को सजाकर इस प्रतियोगिता में भाग लेते हैं।
