लघुकथा – कुछ रिश्ते खून से भी बढ़कर होते हैं यह बात मैं आशु भैया से मिलकर जाना ! मेरे परिवार में मां पापा और हम तीन बहने हैं मुझे हमेशा एक भाई की कमी लगती थी आशु भैया से मैं मनीषा दीदी के जरिए मिली थी पर कब हम तीनों एक भाई बहन के प्यारे से रिश्ते में बंध गए पता ही नहीं चला।
चुनाव का समय चल रहा था और हमें हमारे जिले में चुनाव जागरूकता करने की जिम्मेदारी मिली थी। कुछ स्टीकर दिए गए थे जिसे हमें गली मोहल्ले हर जगह चिपकाने थे ।गर्मी का मौसम होने के कारण हम दिन में यह काम नहीं कर पाते थे इसलिए मैं और मनीषा दीदी ने यह निश्चित किया कि हम शाम को खाना खाने के बाद स्टीकर चिपकाने का काम करेंगे इसलिए हम शाम को निकलते थे।आशु भैया की हमेशा आदत रहती हैं जब भी मैं या दीदी कही घूमने या समय बिताने के लिए बोलते हैं वह हमेशा व्यस्त रहते हैं हमेशा नहीं ही बोलते हैं। उस दिन भी हमने भैया से समय मांगा था पर भैया ने मना कर दिया सो हम दिन में नहीं मिल पाए। तो फिर हमने जैसा निश्चित किया था कि हम शाम को खाना खाने के बाद अपना चुनाव जागरूकता वाला काम करेंगे हम इस काम में लग गए। पर उस दिन काम के चक्कर में काफी रात हो गई थी। लगभग रात के 10:00 बजने वाले थे उसे वक्त हम अपने जिले के बस स्टॉप पर थी तभी वहां एक शराबी आदमी से हमारी बहस होने लग गई। उनको लगा कि हम चुनाव प्रचार कर रहे हैं बात धीरे-धीरे इतनी बढ़ने लगी थी की बात हाथापाई तक पहुंच जाती। तभी मेरी नजर सामने पड़ी फिर मैंने हमारे आसपास देखा और आशु भैया और उनके पूरे दोस्तों के बीच हमने खुद को पाया। भैया उस समय ढाल बनकर खड़े थे। उस समय ना हमने उन्हें कॉल किया था और ना हीं बुलाया था। लड़ाई को खत्म किये । फिर हमने उन्हें पूरी बात बताई फिर वह जो हमारे साथ बाकी के भाई थे, उनको भईया चिल्लाने लग गये की बहन लोग को इतनी रात तक कार्य के लिए बाहर क्यों लेकर आये हो। फिर भैया हमें घर चलने के लिए कहने लगे। हमने कहा हम चले जाएंगे भैया । पर वह नहीं माने और हमें बाइक में बैठकर घर छोड़ने आए।
सच कहते हैं प्यार और फिक्र बताने और जताने का रिश्ता नहीं है बल्कि निभाने का रिश्ता है और आशु भैया के साथ ऐसे बहुत से किससे हैं भैया को जब भी कॉल करो घूमने जाने के लिए या समय बिताने के लिए तो उनके पास कभी समय नहीं रहता। पर जब भी हम किसी मुसीबत में रहते हैं या जरूरत रहती है भैया हमेशा हमारे साथ रहते हैं।
