आस्था या खौफ! झीका में है परेतीन माता का मंदिर, लोग मानते हैं यहां दूध नहीं चढ़ाएंगे तो हो जाता है खराब



बच्चे पैदा होने पर यहां माता के दरबार पर चढ़ती है काली चूड़ियां, रोना हो जाता है बंद

बालोद। बालोद जिले के अर्जुंदा तहसील क्षेत्र के ग्राम झीका में परेतीन दाई (माता) का मंदिर है। जहां पर हर साल दोनों नवरात्र में विशेष आयोजन होता है।

इसे आस्था कहे या परेतीन यानी डायन देवी के प्रति खौफ है कि लोग जब इस रास्ते से गुजरते हैं तो बिना दर्शन के नहीं जाते। खास कर यहां के दूध बेचने वालों में मान्यता है कि अगर हम परेतीन माता को दूध नहीं चढ़ाएंगे तो अर्जुंदा जाते तक हमारा दूध फट जाता है यानी खराब हो जाता है। ऐसा कई लोगों के साथ हो भी चुका है। जिन्होंने इस बात को नजर अंदाज किया था।

तब से लेकर लगातार लोग परेतीन दाई पर आस्था रखते हैं और जो भी व्यक्ति जैसा भी व्यवसाय करते हैं अपने व्यवसाय का कुछ हिस्सा सामान या पैसे मंदिर में दान जरूर करते हैं। वही माता के दरबार में काली चूड़ी चढ़ाने का भी विशेष रिवाज है।

इसके पीछे लोगों में मान्यता है कि अगर किसी के घर भी बच्चा पैदा होता है और वह काफी रो रहा है तो लोग परेतीन दाई को मनाने के लिए आते हैं और उनकी मूर्ति के सामने गेट पर काली चूड़ी बांधकर चले जाते हैं। इससे बच्चा रोना बंद कर देता है और उनके स्वास्थ्य में भी सुधार आता है।जब हम यहां पहुंचे और यहां के प्रमुख लोगों से मिले तो उन्होंने भी इसी तरह की मान्यताओं के बारे में अपनी बातें व्यक्त की।

मंदिर बाद में बना, वहां वर्षों से है नीम का पेड़

ओमप्रकाश सिन्हा ने बताया कि वहां पर परेतीन दाई का मंदिर लगभग 20-25 साल पहले बनाया गया है। मूलतः वहां पर आज भी एक नीम का पुराना पेड़ है। इसी पर ही परेतीन माता का वास मानकर अपनी आस्था के चलते लोगों ने फिर वहां मंदिर बनवाया है। मंदिर के गेट के साथ नीम पेड़ पर काली चूड़ी बांधने का अपना रिवाज है। वही गांव के ही एक बुजुर्ग माखन यादव ने कहा कि दूध फटने की घटना कई लोगों के साथ हो चुकी है। जिन्होंने माता को बिना दूध चढ़ाए आगे बढ़ा है। यहां गांव में अधिकतर लोग दूध बेचने के लिए अर्जुंदा जाते हैं वह जब घर से निकलते हैं तो रास्ते में गांव के अंतिम छोर पर ही माता का मंदिर है। सबसे पहले राउत और ठेठवार वहां पर अपना दूध चढ़ाते हैं तब आगे बढ़ते हैं। गांव में कोई भी शुभ कार्य करना हो तो सबसे पहले परेतीन माता को याद किया जाता है। लोग वहां पूजा पाठ करते हैं। दोनों नवरात्रि में सिर्फ गांव में नहीं दूर दराज के लोग भी अपनी आस्थावश यहां बड़ी संख्या में मनोकामना जोत जलाते हैं।

आस्था या डर इस जगह के प्रति है सवाल?

परेतीन दाई के प्रति आस्था या डर ऐसा है कि बिना दान किए कोई भी मालवाहक वाहन आगे नहीं बढ़ सकता। दूसरे इलाके के लोग जब इस रास्ते से गुजरते हैं तो ये मंदिर देख उसके बारे में जानकर हैरान होते है। लोग सहज विश्वास नहीं करते हैं और इसे खौफ या डर का नाम देते हैं। पर स्थानीय लोग इसे अपनी आस्था बताते हैं। असल में आस्था ही है या डायन देवी के प्रति डर, यह सवाल हमेशा बना हुआ है। यहां के लोग कहते हैं मंदिर के सामने से होकर गुजरना है तो वहां कुछ भी दान (अर्पण/चढ़ाना) करना अनिवार्य है। अगर आप मालवाहक वाहन से जा रहे हैं तो वाहन में जो भी सामान भरा है उसमें से कुछ-न-कुछ चढ़ाना अनिवार्य है। चाहे ईंट, पत्थर, पैरा, हरी घास, मिट्टी, सब्जी, भाजी आदि क्यों न हो। ग्रामीणों की मानें तो नहीं चढ़ाने पर अनिष्ट या वाहनों में खराबी आ जाती है। ऐसा कई बार हो चुका है।

जानकर अंजान बनने में दिक्कत, पर क्षमाशील भी है माता

यह भी बताया जाता है कि कोई भी मंदिर के बारे में जान कर अंजान बन जाता है तो उसे आगे की सफर में परेशानी होती है। यदि अंजान व्यक्ति है तो उसे देवी क्षमा कर देती है।

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