प्रेम रंगों का फाग है होली, शालीनता से उत्सव को मनाये- जगदीश देशमुख



बालोद। भारत की संस्कृति में अपने पर्वों और उत्सवो की विविधता है ।इन पर्वों में लोग जीवन के विविध रंग दिखाई देते हैं। इन रंगों में अपनी सभ्यता ,संस्कृति, प्रेम ,भाईचारा ,सत्य ,अहिंसा ,दया ,करुणा के साथ धर्म दर्शन और अध्यात्म के मानवीय संदेश भरे होते हैं ।उन्हीं पर्वों में एक पर्व होली भी है जिसमें प्रेम रंगों की सात्विकता होती है ।मानवता की पिचकारी से प्रेम रंगों से सराबोर होना चाहिए लेकिन इन पर्वों में अब कलुषता आ गई है। भाईचारा और मनुष्यता का स्थान ईर्ष्या, द्वेष, दुश्मनी ,नशा पान, हत्या लूट जैसे आम मानवीय कृत्य ने ले लिया है और समाज सनातन संस्कृति को धूमिल और कुरूप कर डाला है। जो आज के संदर्भ में सर्वाधिक चिंतनीय है। होली पर उक्ताशय के विचार जिले के वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश देशमुख ने व्यक्त किए।

श्री देशमुख ने कहा कि होलिकोत्सव का महान पर्व हमें प्रकृति पूजा से भी जोड़ता है ।हमारे सनातन संस्कृति में प्रकृति की उपासना ही धर्म है ।ब्रज और अवध में श्री राधा कृष्ण के साथ गोपी ग्वालों के साथ खेले फाग सनातन और प्राचीन होते हुए आज भी समीचीन और प्रासंगिक है ।राधा कृष्ण, श्री सीता राम के साथ खेले गए ब्रजांगनाओ और अवध वासियों की होली हमे सात्विक प्रेम का संदेश देता है ।पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग प्रांतों में मनाई जाने वाली होलिकोत्सव की अलग पहचान और विविधता है ।छत्तीसगढ़ में भी होलिका दहन के बाद होलिका को असत्य ,अन्याय, दुराचार ,बुराई के रूप में तथा प्रह्लाद को सत्य के रूप में प्रतिपादित किया जाता है ।

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