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क्या खेतों की मेड़ों से गायब हो जाएंगे पेड़? हरे वृक्षों की कटाई पर गंभीर चिंता

पर्यावरण बचाने के नारों के बीच तेजी से कट रहे बबूल, बेर, कहुआ और कशही के वृक्ष

लेखक: धर्मेंद्र निषाद, डौंडीलोहारा

आज जब पूरा विश्व पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, तब हमारे गांव-देहात और खेत-खलिहानों से हरे-भरे वृक्षों का तेजी से गायब होना चिंता का विषय बन गया है। विशेष रूप से लक्खा मशीन और चेनसा जैसे आधुनिक उपकरणों के बढ़ते उपयोग के बाद बालोद जिले सहित ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में वृक्षों की कटाई हो रही है।

एक समय था जब खेतों की मेड़ों पर खड़े बबूल, बेर, कहुआ, कशही और अन्य छायादार वृक्ष किसानों की पहचान हुआ करते थे। ये केवल पेड़ नहीं थे, बल्कि पूर्वजों की धरोहर और प्रकृति से उनके जुड़ाव की जीवंत निशानी थे। किसान खेतों में काम करते समय इन्हीं वृक्षों की छांव में विश्राम करते थे। पक्षियों का बसेरा भी इन्हीं पर होता था और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी।

आज स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है। कुछ रुपयों के लालच में वर्षों पुराने हरे-भरे वृक्षों को काटा जा रहा है। खेतों की मेड़ें धीरे-धीरे वृक्ष विहीन होती जा रही हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन वृक्षों की कटाई किस अनुमति के आधार पर की जा रही है? क्या संबंधित विभागों की जानकारी में यह सब हो रहा है? यदि हां, तो पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?

यह भी विचारणीय विषय है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर आयोजित रैलियां, पोस्टर, अभियान और शपथ कार्यक्रम क्या केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं? यदि जमीन पर वृक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, तो ऐसे अभियानों का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय लकड़ी के बिचौलिये अक्सर किसानों से कम कीमतों पर वृक्ष खरीद लेते हैं। कई बार किसानों को वृक्षों के पर्यावरणीय महत्व और कानूनी पहलुओं की पूरी जानकारी नहीं होती। ऐसे में प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी बनती है कि वे लोगों को जागरूक करें और अनियंत्रित कटाई पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करें।

वृक्ष केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जीवन का आधार हैं। जल, जंगल और जमीन किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरी मानवता और प्रकृति की साझा धरोहर हैं। यदि आज हम इनकी रक्षा नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा।

आज आवश्यकता केवल पौधारोपण की नहीं, बल्कि पहले से मौजूद वृक्षों को बचाने की भी है। समाज, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों को मिलकर इस दिशा में प्रयास करना होगा। जब तक वृक्षों की अंधाधुंध कटाई पर रोक नहीं लगेगी, तब तक पर्यावरण संरक्षण का सपना अधूरा ही रहेगा।

आइए, हम सभी संकल्प लें कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे। यदि सामूहिक प्रयास होंगे तो निश्चित ही आने वाले समय में हरियाली लौटेगी और एक नया सवेरा अवश्य आएगा।

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