बिच्छू के डंक से 4 साल की प्रगति को खोया, अब 10 साल से लोगों को बचाने के लिए चला रहे अभियान
बालोद। एक पिता ने अपनी चार साल की मासूम बेटी को बिच्छू के डंक से खो दिया, लेकिन इस असहनीय पीड़ा के आगे उन्होंने हार नहीं मानी। बेटी की मौत के दर्द को उन्होंने समाज की सेवा और जनजागरूकता का मिशन बना लिया। बालोद के संजयनगर निवासी शैलेंद्र शर्मा पिछले 10 वर्षों से लोगों को बिच्छू के डंक से बचाव के प्रति जागरूक कर रहे हैं। उनका संकल्प है कि जिस दर्द से उनका परिवार गुजरा, वह किसी दूसरे परिवार को न सहना पड़े।

27 जुलाई 2016 का दिन शैलेंद्र शर्मा के जीवन का सबसे दुखद दिन था। इसी दिन उनकी चार वर्षीय बेटी प्रगति की बिच्छू के डंक से मौत हो गई थी। करीब 10 वर्ष बीत जाने के बाद भी उस घटना की याद उनके मन में आज भी ताजा है। हर वर्ष बेटी की पुण्यतिथि पर वे उसे याद करते हुए लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाते हैं। अब उनकी छोटी बेटी मोक्षा भी इस नेक पहल में उनका साथ दे रही हैं।
घुमाने ले जाने की तैयारी में थी बेटी, जूती में छिपे बिच्छू ने छीन ली जिंदगी
वर्ष 2016 की उस शाम को याद करते हुए शैलेंद्र बताते हैं कि बिजली गुल थी और वे अपनी बेटी प्रगति को घुमाने ले जाने की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान प्रगति जल्दी-जल्दी जूती पहन रही थी। अंधेरा होने के कारण उसे जूती के अंदर छिपा बिच्छू दिखाई नहीं दिया। जैसे ही उसने जूती में पैर डाला, बिच्छू ने उसे डंक मार दिया।
घटना के बाद प्रगति की तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी। परिजन उसे तत्काल जिला अस्पताल बालोद लेकर पहुंचे, जहां से बेहतर उपचार के लिए भिलाई रेफर किया गया। लेकिन रास्ते में ही मासूम ने दम तोड़ दिया। एक पिता के लिए यह ऐसा सदमा था, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
‘मेरी बेटी चली गई, लेकिन अब किसी और की बेटी न जाए’
प्रगति की मौत के बाद शैलेंद्र शर्मा ने अपने मन में एक संकल्प लिया कि अब वे लोगों को बिच्छू के डंक से बचाव के प्रति जागरूक करेंगे। उनका मानना है कि सावधानी, समय पर उपचार और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता से कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
इसी उद्देश्य से उन्होंने बिच्छू के डंक से बचाव और उपचार की बेहतर व्यवस्था को लेकर प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को भी कई बार पत्र लिखकर अपनी मांग रखी। उनका कहना है कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बिच्छू के डंक के उपचार के लिए आवश्यक दवाओं एवं चिकित्सा सुविधाओं की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि पीड़ितों को समय पर इलाज मिल सके।
बेटी की याद में लगाया नीम का पौधा, आज वही बना प्रगति की पहचान

बेटी के निधन के कुछ समय बाद जब उसका जन्मदिन आया, तब शैलेंद्र ने तालाब के पास एक नीम का पौधा लगाया। उन्होंने उस पौधे को अपनी बेटी प्रगति की स्मृति मान लिया। आज 10 वर्ष बाद वह पौधा एक विशाल पेड़ बन चुका है।
शैलेंद्र हर वर्ष बेटी के जन्मदिन और पुण्यतिथि पर उस पेड़ के पास पहुंचते हैं। वहां दीप जलाते हैं, जल अर्पित करते हैं और अपनी बेटी को याद करते हैं। उनके लिए यह पेड़ केवल एक पौधा नहीं, बल्कि प्रगति की जीवंत स्मृति और उनके जीवन के सबसे अनमोल रिश्ते का प्रतीक है।
10 साल से जारी है जागरूकता अभियान

बेटी को खोने के बाद शैलेंद्र चाहते तो अपने दुख में टूट जाते, लेकिन उन्होंने अपने दर्द को समाज की ताकत बना लिया। पिछले 10 वर्षों से वे अपने खर्च पर जागरूकता पोस्टर तैयार करवाकर लोगों तक पहुंचा रहे हैं।
इन पोस्टरों के माध्यम से वे लोगों को सावधानी बरतने का संदेश देते हैं। उनका कहना है कि जूते-चप्पल पहनने से पहले उन्हें अच्छी तरह झाड़कर देखें, अंधेरे में टॉर्च का इस्तेमाल करें, घर के कोनों और आसपास साफ-सफाई रखें तथा बिच्छू के डंक की स्थिति में बिना समय गंवाए तत्काल अस्पताल पहुंचें।
वे दुकानों, घरों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर जाकर लोगों को जागरूक करते हैं। उनके अभियान का उद्देश्य साफ है—किसी और पिता की गोद सूनी न हो, किसी और मां को अपनी संतान न खोनी पड़े।
प्रगति की याद बनी दूसरों की जिंदगी बचाने की प्रेरणा
शैलेंद्र शर्मा की कहानी केवल एक पिता के दर्द की कहानी नहीं, बल्कि उस दर्द को समाजसेवा में बदल देने की प्रेरणादायक मिसाल है। प्रगति आज उनके बीच नहीं है, लेकिन उसकी याद में लगाया गया नीम का पेड़ और पिछले 10 वर्षों से चलाया जा रहा जागरूकता अभियान आज भी लोगों को सावधानी और सुरक्षा का संदेश दे रहा है।
एक बेटी की असमय मौत ने एक पिता को तोड़ने के बजाय ऐसा संकल्प दिया, जो आज दूसरों की जिंदगी बचाने की उम्मीद बन गया है। यही शैलेंद्र शर्मा के संघर्ष की सबसे बड़ी प्रेरणा है।









