1980 के दशक में बेटियों को पढ़ाने के लिए समाज से लड़े पिता, आज वही तीनों बेटियां शिक्षा और सेवा की बनीं पहचान
बालोद। एक समय था जब बेटियों की शिक्षा को समाज में प्राथमिकता नहीं दी जाती थी। अनेक परिवारों में लड़कियों की पढ़ाई सीमित कर दी जाती थी, लेकिन ऐसे दौर में एक पिता ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए अपनी तीनों बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने का संकल्प लिया। आज वही बेटियां शिक्षा विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हुए अपने पिता के सपनों को साकार कर रही हैं और समाजसेवा के माध्यम से नई मिसाल भी कायम कर रही हैं।
यादव समाज की ये तीनों बेटियां आज शिक्षा, संस्कार और सेवा की ऐसी पहचान बन चुकी हैं, जिनकी कहानी पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

शिक्षा के क्षेत्र में बनाई विशिष्ट पहचान
बड़ी बहन दुर्गेश नंदिनी यादव वर्तमान में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दुधली में प्राचार्य के पद पर सेवाएं दे रही हैं।
मंझली बहन विनोदिनी यादव शासकीय विद्यालय कन्नेवाड़ा में प्राचार्य के रूप में कार्यरत हैं।
वहीं सबसे छोटी बहन कादंबिनी यादव शासकीय विद्यालय बड़गांव में व्याख्याता के रूप में विद्यार्थियों के भविष्य को नई दिशा दे रही हैं।
तीनों बहनों ने वर्षों की मेहनत, अनुशासन और समर्पण से शिक्षा जगत में अपनी अलग पहचान बनाई है।

एक पिता की दूरदृष्टि ने बदल दी बेटियों की जिंदगी
तीनों बहनों की सफलता के पीछे उनके पिता स्वर्गीय एल.पी. यादव, जो स्वयं सेवानिवृत्त प्राचार्य थे, की दूरदर्शी सोच और शिक्षा के प्रति अटूट विश्वास रहा।
वर्ष 1980 के दशक में जब बालिका शिक्षा को लेकर समाज में अनेक संकोच थे और लड़कियों का गणित संकाय में अध्ययन करना बेहद दुर्लभ माना जाता था, तब उन्होंने सामाजिक दबावों की परवाह किए बिना अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाई।
विशेष अनुमति प्राप्त कर उन्होंने अपनी बेटियों का प्रवेश जिले के आदर्श बालक विद्यालय में कराया। उस समय पूरे बैच में केवल दो-तीन बालिकाएं ही लड़कों के साथ अध्ययन कर रही थीं। आज उनकी वही दूरदृष्टि बेटियों की उल्लेखनीय उपलब्धियों के रूप में सामने है।
पुण्यस्मृति को बनाया समाजसेवा का पर्व

तीनों बहनें अपने पिता की पुण्यतिथि को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि उसे समाजसेवा का माध्यम बनाती हैं।
इस वर्ष स्वर्गीय एल.पी. यादव की 11वीं पुण्यस्मृति पर घरौंदा आश्रय गृह बालोद, सिवनी तथा मूक-बधिर विद्यालय उमरादाह में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ समय बिताकर उन्हें भोजन कराया गया।
उनका मानना है कि जरूरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान लाना ही उनके पिता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
कादंबिनी यादव समाजसेवा में भी निभा रहीं सक्रिय भूमिका
सबसे छोटी बहन कादंबिनी यादव शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय हैं। वे नियमित रूप से रक्तदान करती हैं तथा महिलाओं को नेतृत्व, जागरूकता और सामाजिक भागीदारी से जोड़ने वाले कार्यक्रमों में सहभागिता निभाती हैं।
उन्होंने पूर्व विधायक एवं शिक्षक स्वर्गीय लोकेंद्र यादव के मानवीय विचारों से प्रेरित होकर देहदान का संकल्प भी लिया है। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भी मानव शरीर यदि चिकित्सा शिक्षा या किसी जरूरतमंद के काम आ सके तो इससे बड़ी मानव सेवा कोई नहीं।
हर वर्ष सेवा कार्यों से जीवित रखती हैं पिता के संस्कार
तीनों बहनों द्वारा समय-समय पर अनेक सामाजिक एवं मानवीय कार्य किए जाते रहे हैं, जिनमें—
- मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान
- जरूरतमंद बच्चों को स्वेटर, जूते-मोजे एवं स्कूल बैग का वितरण
- वृद्धाश्रम में अनाज, साड़ी एवं कंबलों का वितरण
- दिव्यांग संस्थानों में सहयोग
- न्यौता भोज का आयोजन
- सफाई दीदियों का सम्मान
- घरौंदा आश्रय गृह में कूलर दान
जैसी प्रेरणादायक पहलें शामिल हैं।
शिक्षा के साथ संस्कार देने का संकल्प
तीनों बहनें अपने-अपने विद्यालयों में विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम की शिक्षा ही नहीं, बल्कि अनुशासन, नैतिकता, संवेदनशीलता और समाजसेवा के संस्कार भी प्रदान कर रही हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यह परिवार शिक्षा और सेवा की संस्कृति का जीवंत उदाहरण है, जिसने समाज को सकारात्मक दिशा देने का कार्य किया है।
बेटियां बोझ नहीं, बदलाव की ताकत हैं
इन तीनों बहनों की प्रेरक यात्रा यह संदेश देती है कि जब परिवार बेटियों पर विश्वास करता है और उन्हें अवसर देता है, तब वे केवल अपने परिवार ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की पहचान बन जाती हैं।
आज शिक्षा, संस्कार और समाजसेवा का यह अद्भुत संगम बालोद जिले ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का विषय बन चुका है।





