
बालोद। जिले का प्रसिद्ध गोंदली बांध इन दिनों एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है। इसकी वजह है जलस्तर कम होने के बाद वर्षों से पानी में डूबी एक प्राचीन संरचना का दोबारा दिखाई देना। रहस्यमयी इमारत को देखने के लिए आसपास के ग्रामीणों के साथ-साथ शहरों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। जलाशय के बीच उभरी इस संरचना को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। कोई इसे पुराने गांव के घर का अवशेष मानता है, तो कोई इसे शीतला माता या महामाई मंदिर बताता है। वर्षों से जल में समाई यह इमारत आज भी इतिहास और लोकस्मृतियों की साक्षी बनी हुई है।
कभी आबाद थे कई गांव, आज जलाशय में समा चुका इतिहास
स्थानीय लोगों के अनुसार, जिस क्षेत्र में आज गोंदली बांध फैला हुआ है, वहां लगभग 80–85 वर्ष पहले गोंदली, कोलियारी, बोईरडीह, अलनियां भांवर, परसुटोला और जुझारा जैसे गांव बसे हुए थे। बांध निर्माण के दौरान इन गांवों का विस्थापन कर ग्रामीणों को अन्य स्थानों पर बसाया गया। आज यह इलाका गोंदली गांव से अधिक गोंदली डैम के नाम से जाना जाता है, जो सहगांव से लगभग तीन किलोमीटर अंदर स्थित है।

जल कम हुआ तो फिर दिखे इतिहास के निशान
जलस्तर घटने के बाद सामने आई इस संरचना को करीब से देखने पहुंचे लोगों ने बताया कि इमारत पर आज भी प्राचीन कलाकृतियां और उकेरी गई आकृतियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। इसके समीप एक चौरा भी मौजूद है, जहां स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पहले धार्मिक अनुष्ठान होते थे। आसपास टूटे हुए पत्थर और अन्य अवशेष भी दिखाई देते हैं। आज भी कई श्रद्धालु यहां नारियल और अगरबत्ती चढ़ाकर इसे माता शीतला या महामाई का स्थान मानते हुए श्रद्धा अर्पित करते हैं।

स्थानीय बुजुर्ग बोले—यह घर नहीं, महामाई मंदिर था
इस रहस्य को जानने के लिए विस्थापित परिवारों से बातचीत की गई। तरौद निवासी वरिष्ठ ग्रामीण मलखम राणा ने बताया कि यह कोई सामान्य मकान नहीं, बल्कि महामाई मंदिर था, जिसका निर्माण गोंडवाना शासनकाल में कराया गया था। उनके अनुसार उस समय डौंडी से लेकर लोहारा क्षेत्र तक गोंडवाना शासन का प्रभाव था और यह मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।
बांध निर्माण के साथ बदल गई पूरी तस्वीर
स्थानीय जनश्रुतियों और बुजुर्गों के अनुसार, बांध निर्माण से पहले क्षेत्र का सर्वे किया गया और बाद में गांवों को अन्य स्थानों पर बसाया गया। जलाशय बनने के बाद पूरा इलाका पानी में समा गया। हालांकि हर बार जलस्तर कम होने पर उस दौर की कई निशानियां फिर दिखाई देने लगती हैं, जिनमें यह प्राचीन संरचना, पुराने कुएं और जमीन से जुड़े पेड़ों के अवशेष शामिल हैं।
मानसून के बाद फिर जलमग्न हो जाएगा यह इतिहास
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस बार जलाशय के गेटों में सुधार कार्य और जलस्तर कम होने के कारण यह संरचना पूरी तरह दिखाई दे रही है। लेकिन मानसून सक्रिय होते ही इसके फिर से पानी में डूब जाने की संभावना है।
गोंदली बांध आने वाले पर्यटकों के लिए पास स्थित चितवा डोंगरी भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र है, जहां चट्टानों पर बने प्राचीन भित्ति चित्र लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
जल में छिपी यह इमारत आज भी मानो एक सवाल पूछती है—क्या यह केवल एक खंडहर है, या किसी पूरे दौर का जीवित इतिहास, जो हर वर्ष कुछ समय के लिए पानी से बाहर आकर अपनी कहानी सुनाना चाहता है?





