चिमनी की रोशनी से राज्यपाल सम्मान तक: 38 वर्षों तक शिक्षा की अलख जगाने वाले प्राचार्य दयालूराम पिकेश्वर बने प्रेरणा के प्रतीक

संघर्ष, समर्पण और संस्कारों से गढ़ी एक ऐसी शख्सियत, जिसने हजारों विद्यार्थियों का भविष्य संवारा
बालोद। वनांचल अंचल की मिट्टी से निकलकर संघर्ष, मेहनत और शिक्षा के बल पर अपनी अलग पहचान बनाने वाले राज्यपाल पुरस्कृत प्राचार्य दयालूराम पिकेश्वर ने 31 जनवरी 2026 को लगभग 38 वर्षों की गौरवशाली शासकीय सेवा पूर्ण कर सेवानिवृत्ति ली। उनका जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि सीमित संसाधन कभी भी बड़े सपनों की राह नहीं रोक सकते।
चिमनी की रोशनी में लिखी सफलता की कहानी
24 जनवरी 1964 को ग्राम भंवरमरा (नेतामटोला) के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे दयालूराम पिकेश्वर ने बचपन अभावों के बीच बिताया। गांव में बिजली नहीं थी, इसलिए चिमनी की रोशनी में पढ़ाई करना उनकी दिनचर्या थी। रोजाना लगभग दो किलोमीटर जंगल के रास्ते पैदल स्कूल पहुंचना और कठिन परिस्थितियों में भी पढ़ाई जारी रखना उनके दृढ़ संकल्प का परिचायक रहा।

पिता का साया उठा, लेकिन हौसला नहीं टूटा
उच्च शिक्षा के लिए वे छात्रावास में रहकर पढ़ाई करने बड़गांव पहुंचे। इसी दौरान दसवीं बोर्ड परीक्षा के समय उनके पिता का निधन हो गया। यह उनके जीवन का कठिन दौर था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आगे चलकर उन्होंने शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की और विधि की पढ़ाई भी शुरू की।
1989 में शुरू हुई शिक्षा सेवा की यात्रा
3 मार्च 1989 को उन्होंने शासकीय प्राथमिक शाला गंजईडीह में सहायक शिक्षक के रूप में अपने शिक्षकीय जीवन की शुरुआत की। इसके बाद प्रधान पाठक, उच्च वर्ग शिक्षक और विभिन्न विद्यालयों में जिम्मेदार पदों पर कार्य करते हुए शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
20 सितंबर 2011 से 28 नवंबर 2025 तक शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला मड़ियाकट्टा में उनके नेतृत्व में विद्यालय ने नई पहचान बनाई। उत्कृष्ट कार्यों के आधार पर उन्हें 29 नवंबर 2025 को प्राचार्य पद पर पदोन्नत कर शासकीय हाई स्कूल संबलपुर में पदस्थ किया गया।
सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षा से नहीं टूटा नाता
औपचारिक सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने विद्यार्थियों के मार्गदर्शन और विद्यालयीन गतिविधियों से जुड़कर शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी। उनका सहज व्यवहार, अनुशासन और कार्यशैली आज भी शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत है।
राज्यपाल पुरस्कार सहित मिले अनेक सम्मान
शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दयालूराम पिकेश्वर को वर्ष 2021 में राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें ज्ञानदीप पुरस्कार, श्रेष्ठ प्रधान पाठक पुरस्कार, स्वच्छता पुरस्कार, राष्ट्रीय गौरव शिक्षक सम्मान और शिक्षक रत्न सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया।
विद्यालय को बनाया समाज परिवर्तन का केंद्र
उन्होंने शिक्षा को केवल कक्षा तक सीमित नहीं रखा। बस्ता बोझ मुक्त शाला, बालिका शिक्षा, स्वच्छता अभियान, नशा मुक्ति, वृक्षारोपण, साक्षरता अभियान, पल्स पोलियो और पालक-बालक सम्मेलन जैसे अनेक सामाजिक अभियानों को विद्यालय से जोड़कर समाज में सकारात्मक बदलाव का संदेश दिया।
भव्य विदाई की तैयारी
यद्यपि वे औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन आगामी शैक्षणिक सत्र में शिक्षा विभाग, सहयोगी शिक्षक, विद्यार्थी और सामाजिक संगठन उनके सम्मान में भव्य विदाई समारोह आयोजित करेंगे, जिसमें उनके चार दशक के लगभग शिक्षा योगदान को याद किया जाएगा।
एक शिक्षक, जो हमेशा प्रेरणा बनकर रहेंगे
दयालूराम पिकेश्वर का जीवन बताता है कि संघर्ष सफलता की राह का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत होता है। उन्होंने अपने कर्म, अनुशासन और समर्पण से यह सिद्ध किया कि एक शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि पीढ़ियों का भविष्य गढ़ता है।
“हाथों को थाम कर मंजिल की ओर ले चले गए,
कामयाबी और तरक्की की सौगात दे चले गए।
आज विदा होकर भी शिक्षा जगत को प्रेरणा दे चले गए।”





