DAILY BALOD NEWS

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होलिका दहन विशेष: अंगारों पर आस्था की परीक्षा, डौंडीलोहारा ब्लॉक के ग्राम जाटा दाह में कायम है सदियों पुरानी अनोखी परंपरा

बालोद। होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, लेकिन बालोद जिले के डौंडीलोहारा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम जाटा दाह में यह पर्व एक अनोखी परंपरा के कारण विशेष पहचान रखता है। यहां होलिका दहन के बाद अंगारों पर चलने की परंपरा पीढ़ियों से निभाई जा रही है। इसे आस्था कहें या अंधविश्वास—लेकिन ग्रामीणों के लिए यह श्रद्धा और विश्वास का उत्सव है।

रात से सुबह तक चलता है अनुष्ठान

गांव के कुआं चौक के पास होलिका दहन की तैयारियां विशेष रूप से की जाती हैं। ग्रामीण नगाड़े बजाते हुए आधी रात से ही एकत्रित होने लगते हैं। परंपरा के अनुसार सुबह लगभग 4 बजे विधिवत होलिका दहन किया जाता है। अग्नि शांत होने के बाद जब लकड़ियां अंगारों में बदल जाती हैं, तब सुबह 6 से 7 बजे के बीच अंगारों पर चलने की रस्म निभाई जाती है।

यह पूरा दृश्य रोमांच और आस्था से भरा होता है। ढोल-नगाड़ों की गूंज, जयकारों की आवाज और ग्रामीणों की श्रद्धा इस आयोजन को अलग ही स्वरूप देती है।

पीढ़ियों से चली आ रही मान्यता

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। मान्यता है कि अंगारों पर चलने से जीवन में आए दुख, कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं। जो व्यक्ति सच्चे मन से श्रद्धा के साथ अंगारों पर चलता है, उसे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

आज की युवा पीढ़ी भी इस परंपरा में उतना ही विश्वास रखती है जितना उनके पूर्वज रखते थे। युवाओं का कहना है कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आस्था की परीक्षा है।

महिलाओं और बच्चों के लिए पाबंदी

इस परंपरा में कुछ नियम भी तय हैं। अंगारों पर चलने की अनुमति केवल युवा और वयस्क पुरुषों को होती है। महिलाओं और छोटे बच्चों के अंगारों पर चलने पर पाबंदी है। ग्रामीणों का मानना है कि यह परंपरा विशेष अनुष्ठानिक नियमों के तहत निभाई जाती है, इसलिए इसका पालन आवश्यक है।

आसपास के गांवों से भी पहुंचते हैं लोग

जाटा दाह की यह अनोखी परंपरा आसपास के गांवों में भी प्रसिद्ध है। केवल इसी गांव के लोग ही नहीं, बल्कि आसपास के कई गांवों के श्रद्धालु भी होलिका दहन के बाद अंगारों पर चलने के लिए यहां पहुंचते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार अब तक इस परंपरा के दौरान किसी को कोई शारीरिक नुकसान नहीं हुआ है। न तो पैरों में छाले पड़ते हैं और न ही किसी प्रकार की गंभीर तकलीफ होती है। इसे लोग ईश्वर की कृपा और चमत्कार मानते हैं।

आस्था और विज्ञान के बीच चर्चा

जहां ग्रामीण इसे भगवान की कृपा और आस्था का परिणाम मानते हैं, वहीं कुछ लोग इसे मानसिक दृढ़ता और सामूहिक विश्वास की शक्ति भी बताते हैं। हालांकि गांव के लिए यह परंपरा केवल तर्क का विषय नहीं, बल्कि श्रद्धा और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है।

इस बार का विशेष संयोग

इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को किया जाएगा। 3 मार्च को ग्रहण के कारण रंगों की होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। ऐसे में जाटा दाह गांव में 2 मार्च की रात से ही विशेष उत्साह रहेगा और सुबह अंगारों पर चलने की परंपरा निभाई जाएगी।

गांव की पहचान बन चुकी है परंपरा

ग्रामीण जगत पाल सिन्हा ने बताया कि जाटा दाह की यह परंपरा अब गांव की पहचान बन चुकी है। होली के अवसर पर यह आयोजन पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय रहता है। ग्रामीण इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं और आने वाली पीढ़ियों को भी इसे सहेजकर रखने की प्रेरणा देते हैं। यह प्रथा कब से शुरू हुई,इसके बारे में कोई नहीं जानते। आज मुझे 61 वर्ष हो चुके हैं। मुझसे पहले मेरे दादा परदादा के समय से यह प्रथा चली आ रही है।
होलिका दहन की पावन अग्नि में जहां बुराइयों के दहन का प्रतीक छिपा है, वहीं जाटा दाह में अंगारों पर चलने की परंपरा आस्था, साहस और सामूहिक विश्वास का प्रतीक बन चुकी है। यह आयोजन होली के पर्व को यहां एक अलग ही आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रंग दे देता है।

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