आत्मा की निर्मलता ही धर्म का सार है



बालोद– भगवान महावीर ने अपनी अंतिम देशना में संसार को असार बताया। भौतिक जगत के प्रति लोगो का आकर्षण ऐसा कि उसे आत्मा का शाश्वत सुख गौण दिखाई देता है। संसार के पदार्थो के पीछे पागलों की तरह दौड़ रहे हैं। उन पदार्थों को कौन भोगेगा, किसके लिए इकट्ठा कर रहे हैं ये भी पता नही, फिर भी भौतिक पदार्थों का आकर्षण कम नही हो रहा। संत वैराग्यमुनि ने अपने प्रवचन की श्रृंखला में कहा कि जिन्हें परमात्मा के वचनों के प्रति श्रद्धा हो वो उसके विपरीत आचरण नही कर सकता।परमात्मा ने शाश्वत सुख क्या है पहले इसे समझा फिर उसे अमल में लाया फिर उन्होंने उपदेश दिया ।विश्व स्तर पर जैन धर्म के सिद्धांतों को साइंटिफिक लेबल प्राप्त है।उसे जानने और समझने के लिए स्वाध्याय करना और उसे आचरण में उतारना आवश्यक है। भगवान के सारे उपदेश पाप से बचने और आत्मा के उत्थान के लिए ही हैं। इसे आत्मसात करके ही जीवन मे सरलता आ सकती है। उन्होंने कहा कि सच्चा श्रावक वही है जिसमे साधुता का भाव हो और सच्चा साधु वही जिसमे कषाय न हो। देव गुरु,धर्म के प्रति आस्था से ही आत्मा को निर्मल बनाने का मार्गप्रशस्त हो सकता है,इसे आचरण में लाना होगा। अपने अंदर के राग द्वेष,क्रोध ,मोह ,लोभ आदि कषायों को दूर करके ही धर्म किया जा सकता है। आत्मा का जो स्वभाव होता है वह कषायों से रहित होता है। आत्मा की निर्मलता ही धर्म का सार है।संसार को सार मानकर जो सुख खोज रहे है वे मृगतृष्णा में जी रहे हैं,।

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