
बालोद/ गुरूर- गुरूर ब्लॉक के ग्राम तार्री में ग्रामीणों द्वारा रावण की प्रतिमा को सहेजने का काम किया जा रहा है। यहां लगभग 10 फीट ऊंची रावण की प्रतिमा तैयार की जा रही है। यह प्रतिमा उसी जगह पर बनाई जा रही है जहां पुरानी प्रतिमा थी, जो काफी टूट गई थी। बता दे कि इस गांव के रावण की प्रतिमा से एक विशेष पहचान है। हालांकि इस गांव में निषाद समाज द्वारा मुख्य मार्ग पर तालाब के पास श्री राम जानकी मंदिर भी 2002 से 2007 के बीच बनाया गया है। जहां निषाद समाज के लोग प्रतिदिन सुबह-शाम आरती करते हैं।

इस मंदिर से लगभग 100 मीटर की दूरी पर सड़क के दूसरे किनारे पानी टंकी के पास रावण की प्रतिमा है। इस प्रतिमा से कुछ दूरी पर रावण की अलग से पुतला जलाकर ग्रामीणों द्वारा 2 अक्टूबर यानी आज दशहरा मनाया जाएगा। कुछ सालों से इस गांव को लेकर एक अफवाह भी फैला हुआ था कि यहां राम और रावण की आमने-सामने मंदिर है। राम के साथ रावण की भी पूजा होती है, जब हमने मामले की सच्चाई पता किया तो यह सब बातें निराधार लगी। ग्रामीणों ने बताया कि यहां ऐसा कुछ नहीं है। राम मंदिर निषाद समाज का बनाया हुआ है। जिसमें समाज के ही लोग पूजा करने जाते हैं। हालांकि दूसरे लोगों को भी वहां पूजा करने को लेकर कोई पाबंदी नहीं है। रही बात रावण की पूजा को लेकर तो ऐसा यहां कोई नियमित पूजा नहीं होती है। रावण के सीमेंट का पुतला भले बना हुआ था, जो टूटने के कारण जर्जर हो गया था, जिसे नया बनवाया जा रहा है। लगभग 80 हजार रुपए ग्रामीणों ने आपस में चंदा करके इस पुतला को नए सिरे से तैयार किया है। ग्रामीणों ने बताया कि रावण का यहां कोई मंदिर नहीं है। कुछ सालों से कुछ लोगों द्वारा इस रावण के पुतले को लेकर अफवाह फैला दी गई थी कि यहां राम और रावण की पूजा होती है। राम और रावण का मंदिर आमने-सामने है। पर वास्तव में ऐसा कुछ यहां नहीं है।
स्व. लोकेंद्र यादव के पूर्वजों ने कराया था मालगुजारी वाले गांव में रावण के पुतले का निर्माण
गांव के नौशाद कुरैशी ने बताया कि रावण के पुतले को लेकर हमारे गांव की विशेष पहचान तो है, पर उसकी कोई नियमित पूजा नहीं होती है, ना ही उसका कोई मंदिर है। दशहरा के दिन सामान्य जो पुतला दहन के पहले पूजा की जाती है, वही पूजा पाठ होता है और कुछ दूरी पर पुतला बनाकर रावण का दहन भी किया जाता है। बुजुर्गों से पता चलता है कि इस पुतले का निर्माण पूर्व विधायक स्वर्गीय लोकेंद्र यादव के पूर्वजों द्वारा किया गया था। जहां-जहां स्व लोकेंद्र यादव के परिवार की जमींदारी थी उन्होंने गांव में पुतला बनाया है। आज भी ग्राम तार्री में स्व. लोकेंद्र यादव के नाम से एक बगीचा है इसके अलावा उनकी गृह ग्राम तरौद, अरौद , नेवारीकला में भी इसी तरह की रावण का पुतला बना हुआ है।

पुतला बनाने का यह था उद्देश्य
ग्रामीण चंद्रहास यादव ने बताया कि यादव समाज द्वारा बनाए गए रावण के पुतले का उद्देश्य यही था कि रावण कितना ही बड़ा विद्वान और ब्राह्मण भले था, पर उसके सिर पर गधा सवार था। जो ये प्रतीक था कि अहंकार से भरा ज्ञान किसी काम का नहीं आता और एक दिन सब कुछ चला जाता है। अहंकारी रावण का जिस तरह से नाश हुआ यह पुतला आने वाली पीढ़ी को यह सीख देता है कि हमें अपने ज्ञान पर किसी तरह से अहंकार नहीं करना चाहिए। इसी सीख का संदेश देने के लिए ही इस पुतले को बनाया गया है।
हल्बा समाज बाहुल्य गांव पर नहीं करते रावण की पूजा
छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में कई जगह हल्बा समुदाय के लिए रावण पूजनीय है। वे इसे एक महान राजा और देवता के रूप में पूजते हैं, ना की बुराई के प्रतीक के रूप में। यह प्रथा छत्तीसगढ़ के गढ़चिरौली क्षेत्र में विशेष रूप से प्रचलित है। जहां गोंड और हल्बा आदिवासी रावण को अपना महान राजा मानते हैं और विजयदशमी के अवसर पर रावण की पूजा करते हैं । हल्बा और गोंड समुदाय का मानना है कि रावण महान योद्धा और विद्वानी थे। तार्री भी हल्बा समुदाय बाहुल्य ग्राम है लेकिन यहां ऐसी कोई परंपरा या प्रथा नहीं है। यहां के हल्बा समाज के लोग रावण को नहीं पूजते हैं।
