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संविधान,समानता और इंसानियत के मार्ग पर चलने की जरूरत : बिजेंद्र सिन्हा दुर्ग (लेख)

बालोद l सदियों से सामाजिक परम्पराओं, दकियानुसी रीति-रिवाजों और रूढ़ीवादी नियमों से बंधे भारतीय समाज में प्रेम-संबंध के चलते लाखों जिन्दगीयां तबाह हो जाती हैं। निश्चित ही इन मामलों में अपहरण,जोर जबरदस्ती, छेड़छाड़ अपराध है परन्तु प्रेम संबंध के कारण आए दिन होने वाली जघन्य हत्याएँ, आत्महत्याएं,युगलों द्वारा एक साथ आत्महत्याएं,परिवार के सम्मान के नाम पर हत्याएँ आदि मानवता को शर्मसार करने वाली अप्रिय घटनाएं 21वीं सदी के आधुनिक व शिक्षित समाज समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं। आज के शिक्षित व आधुनिक युग में भी जातिगत भेदभाव के चलते आनर किलिंग यानि कथित सम्मान के लिए अमानवीयता की सारी हदों को पार करते हुए परिजनों द्वारा अपनी ही युवा सन्तानों की हत्या कर दी जाती है जिसे कथित सम्मान के लिए की गई हत्या का रूप दे दिया जाता है। विकसित मानसिकता वाले व सभ्य समाज में भी निर्ममता से अपनी ही स॔तानो की जान ले लेना भी विडम्बना है। पशु-पक्षियों व मनुष्य में भले ही बौद्धिक चेतना शक्ति का ही अन्तर है परन्तु पशु-पक्षियों का जीवन भी प्रेम और संवेदना से परिपूर्ण होता है। पशु-पक्षियां भी अपनी सन्तान की सुरक्षा के हर उपाय करती है। वे भी अपनी सन्तान को संवेदना व प्रेम से सींचती है। आधुनिक युग में भी हो रही इस तरह की घटनाओं पर चिंतन की जरूरत है। यह कैसे समाज की रचना हो रही है जहाँ भौतिक विकास तो बहुत हो रहा है लेकिन मानवीय संवेदना क्षीण होती जा रही है।हिंसा व अपराध से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। लोगों में कानून का भय का समाप्त होते जाना भी चिन्तन का विषय है।इस तरह हजारों लोगों को जान गंवानी पड़ती है तो यह विचारणीय है कि सामाजिक विकास का स्वरूप इतना दुखद कैसे हुआ। ऐसी अप्रिय व दुखद घटनाएं जब होती हैं तो हमारी सारी मानवीय प्रगति बेमानी साबित होती है। ऐसी निर्मम व जघन्य घटनाएं समाज को विचलित करती है।
निश्चित ही स्वतंत्रता या व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आड़ में नैतिकता की अवहेलना या फिर मानवीय गरिमा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए परन्तु दकियानुसी रीति-रिवाजों के नाम पर प्रतिवर्ष कई युवक-युवतियों की हत्याएं आत्महत्याएं व कानून का परवाह न करना अत्यंत चिन्ताजनक है। ऐसी घटनाओं को सामाजिक समस्याओं के रूप में देखा सकता है जो सामाजिक विकास की दिशा में चुनौती है। सम्भवतः देश में आतंकवाद या अन्य कारणों से जितनी जानें नहीं जातीं उतनी प्रेम-प्रसंग के कारण जाती हैं। इसे सामाजिक समस्याओं के रूप में देखा जाना चाहिए। समाज में आज तक यह अवधारणा बेहद पुख्ता है कि जो युवक-युवती जातिगत मान्यताओं को तोड़ने की कोशिश करे उनके प्रति नाराजगी जा जायज है। ऐसे समाज का निर्माण हो जिसमें सभी व्यक्ति घर परिवार व समाज में स्वयं को सुरक्षित महसूस करें। समाज का कोई भी नियम संविधान के से उपर नहीं हो सकता.
ऐसी समस्याओं के समाधान के लिए वैचारिक क्रांति लानी होगी। आधुनिकता सिर्फ
रहन- सहन,वेश-भूषा व जीवनशैली में ही नहीं बल्कि आधुनिकता विचारों में होना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण व तर्क प्रधान जीवनशैली होना चाहिए।आधुनिक व विकसित मानसिकता वाले युग में भी हो रही इस तरह की घटनाओं पर गम्भीर चिन्तन की जरूरत है। विचारवान प्रबुद्ध वर्ग द्वारा इन सामाजिक समस्याओं के समाधान के प्रयास किए जाने चाहिए। सामाजिक बुराइयों को दूर करने व सामाजिक शान्ति लाने के लिए संविधान, समानता और इंसानियत के मार्ग पर चलने की जरूरत है।

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