बालोद। पिछले दिनों हुए बालोद के कन्नेवाडा गांव में किसानों के प्रदर्शन को बलपूर्वक रोकना और रायपुर में दिव्यांगजनो के साथ शासन प्रशासन की अमानवीय व्यवहार की छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा/ छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ कड़ी निंदा की है। जनक लाल ठाकुर ने विज्ञप्ति जारी करते हुए बताया कि दिव्यांगजन महज अपनी मांगों और समस्याओं को लेकर पिछले 100 दिनों से शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे ,100 दिनों तक उनकी बात सुनने को शासन प्रशासन नहीं पहुंचा तब जाकर दिव्यांग संघ ने विधानसभा घेराव की योजना बनाई । जिसको आधे रास्ते में बलपूर्वक रोका गया। दिव्यांगजनो को बलपूर्वक रोकना क्या शासन प्रशासन को शोभा देता है? 100 दिनों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे तब अगर प्रशासन उनकी बात सुन लेता तो ये नौबत नहीं आती, पर प्रशासन ने अघोषित इमरजेंसी लगा दिया है, न आम जनता की समस्या सुना जा रहा, न उनको प्रदर्शन करने दिया जा रहा है।
सरकार के सभी विभागों में कहीं कर्मचारियों की कमी है तो कहीं चलित मशीनों की कमी है, इन सब का खामियों का भार आम जनता को झेलना पड़ता है, सरकार केवल घोषणाएं करके चुप बैठ जाती है, सरकार सरकारी संस्थाओं को निजीकरण करने में आतुर है, एक तरफ सरकारी शालाओं का युक्तियुक्तकरण करके संस्थाओं को बंद किया जा रहा, दूसरी ओर शराब दुकान को बढ़ावा दिया रहा, जंगलों को काटा जा रहा तो वहीं एक पेड़ मां के नाम पर विरोधाभास कार्यों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।वर्तमान में चल रहे देश और प्रदेश की सरकार की नीतियों को देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अघोषित इमरजेंसी लागू हो चुकी है, आम जनता को प्रदर्शन के लिए रोकना, सड़क पर न उतरने देना, अभिव्यक्ति की आजादी को छीन लेना, गलत नीतियों के विरोध में कर्मचारियों के संगठन को तोड़ना, पत्रकारों को खुलकर लिखने की आजादी छीन लेना, ये सरकार अघोषित इमरजेंसी नहीं है,तो क्या है? अभी हाल में कन्नेवाडा गांव में किसानों की बात न सुनने और खाद न मिलने पर नाराज़गी जताते हुए चक्काजाम किया था उस पर सरकार ने तत्काल चक्काजाम को हटवा दिया और गांव के 16 लोगों पर मुकदमा दायर कर दिया गया, सरकार को प्रदर्शन और चक्काजाम से इतना ही डर है तो किसानों की मांगे तत्काल पूरी करे। किसानी के समय अगर किसानों को खाद नहीं मिलेगा तो फसल चौपट होगी ही, किसान का सब बर्बाद हो जाएगा ये सोचनीय है। किसानों एवं आम जनमानस को सोचना होगा क्योंकि सरकार के अनुसार तो 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो चुकी है, मोदी की गारंटी वाली और डबल इंजन की सरकार इतनी रफ्तार से चल रही है कि न इनको किसानों, मजदूरों की समस्या दिख रही न युवाओं की बेरोजगारी। ऐसे में अपनी समस्याओं के बारे सरकार से न कहे तो किसे कहे? अघोषित इमरजेंसी लागू होने से हम अपना गुस्सा भी जाहिर नहीं कर सकते, क्योंकि देश में अब लोकतंत्र नहीं केवल तानाशाही चल रहा है। सरकार के मंत्रियों, अधिकारियों को जनता की समस्याओं के कोई मतलब ही नहीं है। खाद समस्या पिछले 1 महीनों से है, किसानों ने सरकार के दफ्तरों में गुहार लगाई है पर सरकार है कि अदानी/ अंबानी और बड़े बड़े पूंजीपतियों को खनिज संपदा के खदाने नीलामी करने में व्यस्त है।
अघोषित इमरजेंसी की समय सीमा तय करे सरकार: जनक लाल ठाकुर
