मातृ दिवस विशेष: लोहारा की कुंवारी मां एनुका जुड़वा बेटियों पर लूटा रही ममता, समाज को दे रही अनूठा संदेश



“सुश्री एनुका शार्वा” एक ऐसी मां हैं जिन्होंने शादी नहीं की पर दो प्यारी बेटियों की मां है, “कारा” के जरिए गोद ली थी तीन साल पहले उन बेटियों को

माधुरी यादव, बालोद । मई के दूसरे रविवार को हर साल मातृ दिवस मनाया जाता है। यह दिन मां के प्रयासों, बलिदानों और प्यार का सम्मान करने के लिए होता है। इस खास दिवस पर हम बालोद जिले की ऐसी मां की बारे में बतला रहे हैं जो कुंवारी है। पर दो बेटियों की मां है । दो जुड़वा बेटियों को उन्होंने लगभग 3 साल पहले “कारा” वेबसाइट के जरिए गोद लिया है और उनका बेहतर तरीके से लालन पालन कर रही है। बात कर रहे हैं डौंडीलोहारा की रहने वाली एनुका शार्वा की। जो लोहारा की ही सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में शिक्षिका है। बिना शादी के दो बच्चों को गोद लेकर मां बनने वाली एनुका अपनी बेटियों पर पूरी ममता न्योछावर कर रही है और उन्हें एक सुनहरे भविष्य की ओर ले जा रही है। कहीं भी जाती है तो इन दोनों बेटियों को साथ ले जाती है। दोनों बेटियों और मां सभी के कपड़े एक जैसे होते हैं। सोशल मीडिया प्रोफाइल में भी मां और बेटियों की यह जोड़ी चर्चा का विषय रहती है। कैंसर सर्वाइवर होने के बाद भी एनुका मातृत्व सुख पाकर बेटियों को प्यार और समाज को भी एक अनूठा संदेश दे रहीं हैं। इस मातृ दिवस पर हमने एनुका के इस कदम और जीवन में आई अड़चनों के बारे में जानने का प्रयास किया ताकि दूसरे लोग भी उनके इस काम से प्रेरित हो और जो दंपति निसंतान जीवन जी रहे हैं वह भी किसी अनाथ बच्चों को विधिवत गोद लेकर मातृत्व सुख पा सके।

ऐसे बनी एनुका दो बच्चों की मां

डौंडीलोहारा की रहने वाली सुश्री एनुका शार्वा दत्तक पुत्री अधिग्रण द्वारा अधिरा शार्वा और अद्रिजा शार्वा की मां बनी है। उनका यह कदम बालोद जिले के साथ-साथ हमें लगता है कि छत्तीसगढ़ में पहला ऐसा केस होगा। जिसमें बिना शादी के वह मां बनी है। परंतु जीवन के संघर्ष उनका पीछा ही नही छोड़ रहे। कोरोना काल में उनकी मां का साथ छूट गया। गोद लिए बच्चों का संपूर्ण लालन पालन वह स्वयं करती है। सुश्री शार्वा अनुभव साझा करती है कि हर महिला के अंदर दया, करुणा और प्रेम का वास होता है, मां बच्चे की पहली शिक्षिका होती है। सुश्री शार्वा बताती है कि इस निर्णय में उनके पिता सियाराम शार्वा (तहसील अध्यक्ष पेंशन समाज) और उनके भाइयों का विशेष योगदान रहा। उन्होंने कहा मैने कोई नया कार्य नही किया, जैसा कि हमारे सनातन संस्कृति में हमारे आदर्श “श्री कृष्ण” जी को भी माता यशोदा और नंद जी ने पाला। मैंने भी वही मार्ग चुना है। अधिरा और अद्रिजा को लेकर शार्वा बताती है, कि ये मेरा सौभाग्य है कि बेटियों ने मुझे आसानी से स्वीकार किया। अब हम काफी घुल मिल चुके हैं।

तीन साल पहले ली थी गोद

27 अप्रैल 2023 को बच्चों की फाइनल हियरिंग हुई, जिसमें जिलाधीश मयूरभंज द्वारा उन्हें गोद लेने संबंधित प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। सुश्री शार्वा कहती हैं समाज और व्यक्तिगत जीवन के प्रति सभी दायित्वों का निर्वहन करने के लिए समय का प्रबंधन आवश्यक है। सभी के लिए सुश्री शार्वा का संदेश है कि जीवन में जो कर सकते हो वही निर्णय लेना चाहिए और उस निर्णय को सार्थकता प्रदान करनी चाहिए।

दूसरों के लिए इस तरह दे रही है एनुका संदेश

पारंपरिक समाज के ताने बाने को छोड़कर अनोखे निर्णय को लेकर सुश्री शार्वा कहती हैं, मेरा निर्णय अन्य लोगों के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। कई दंपती जो वर्तमान में अभिभावक नही बन पा रहे,क्योंकि वर्तमान में लोग देरी से शादी कर रहे हैं बच्चों के लिए कई समस्याएं हो रही है और उनके निर्णय से वह चाहती हैं कि ऐसे कई परिवार जो 10 साल 15 साल इलाज करवाते हैं और फिर अपने शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं । इस तरीके के निर्णय लेकर जीवन के सुख का आनंद ले सकते हैं। वंशवाद और रक्त संबंध जैसी मानसिकता से लोग ऊपर उठेंगे और पढ़े लिखे सभ्य समाज दत्तक पुत्र ग्रहण से परिवार सुख अनुभव करेंगे। शार्वा कहती हैं कि जीवन में सभी लड़कियों को एक बार जरूर मातृत्व सुख का लाभ लेना चाहिए। यह अनुभव अद्भुत होते हैं। मैंने मातृत्व सुख का अनुभव और आनंद लेना चाहा और मुझे यह प्राप्त हो रहा है।

3 साल की हो रही दोनों बेटियां, मां बेटियों का बन चुका गहरा रिश्ता

जब बच्चों को गोद ली थी तो वह दोनों मात्र 6 से 7 महीने की थी। जो आज 3 साल के होने वाले है। और बच्चे भी आम बच्चों की तरह ही अपनी मां के बिना नहीं रहतीं और अपनी मां को मैया कहकर बुलाती हैं। सुश्री शार्वा अनुभव साझा करती है कि बच्चे कभी कभी जिद करती है, कि मैया स्कूल मत जाओ और छुट्टी के समय उनका इंतजार करती हैं जो असीम सुख का अनुभव कराती है। कभी ये नहीं लगता कि मैंने बच्चों को गोद लिया है। उनकी तकलीफ रात भर जागना,उनको खिलाना, नहलाना मुझे भी आनंदित करता है। उनका उनकी बेटियों के बीच मातृत्व का गहरा रिश्ता बन चुका है। सुश्री शार्वा बताती है कि बचपन से ही वह मेधावी छात्रा रही और माता-पिता का उनको भरपूर सहयोग मिला। उनका लालन-पालन बिना भेदभाव के भाइयों की तरह ही किया गया। जिसका परिणाम रहा कि शुरू से ही बेहतर करने निर्णय लेने की क्षमता का विकास हुआ। इस निर्णय में उनके पिता सियाराम शार्वा और उनके भाइयों का विशेष योगदान रहा।

“कारा” के जरिए उन्होंने पूरी की अपनी इच्छा

डौंडीलोहारा की रहने वाली सुश्री एनुका शार्वा दत्तक पुत्री अधिग्रण(CARA) द्वारा अधिरा शार्वा और अद्रिजा शार्वा की मां बनी है। वह कहती है मुझे बच्चे शुरू से बहुत पसंद थे। मैने 27 साल की उम्र में आवेदन करना चाहा पर सरकारी नियम अनुसार 30 साल उपरांत ही आप सिंगल पेरेंट्स बन सकते थे। परंतु नियति को कुछ और ही मंज़ूर था,जीवन के संघर्ष पीछा ही नही छोड़ रहे थे इस बीच उन्हें कैंसर जैसी भयावह रोग का भी सामना करना पड़ा। जब वह कैंसर से ठीक होकर आई तो उनकी मातृत्व की चाहत बरकरार थी ,उसके बाद उन्होंने 2019 में अपनी परिवार की पूर्ण सहमति से उन्होंने CARA (सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी)संस्थान में अपना रजिस्ट्रेशन कराया।

शादी के सवालों पर एनुका का यह है जवाब?

शादी के बारे में एनुका शार्वा का कहना है कि जिस समाज से वह ताल्लुक रखती है संख्या बाहुल्य में उनका समाज प्रदेश में पहले या दूसरे स्थान पर आता है। पर कोई भी जानकार किसी कैंसर सरवाइवर से शादी नहीं करना चाहेगा और वह कभी भी किसी के लिए अपने आप को दया का पात्र नहीं बनाना चाहती है। इसलिए उन्होंने अपने जीवन के अधिकतर निर्णयों में वह कार्य किया जिसके लिए वह पूर्ण रूपेण स्वयं जिम्मेदार हो। पर कोई सामाजिक लड़का उन्हें समझकर उनसे शादी करना चाहेगा तो वो जरूर करेंगी।

बेटियों के भविष्य को लेकर हैं सजग

दोनों बच्चों के भविष्य लेकर सुश्री शर्वा का कहना है कि उन्हें एक अच्छी विद्यालयीन शिक्षा और कला में पारंगत करना चाहती हैं और उसके बाद बच्चे जैसे बड़े होंगे, उनकी भी जो इच्छाएं होगी उनके अनुसार उनके भविष्य का निर्णय लिया जाएगा । एनुका ने बताया बड़ी बेटी का नाम अधीरा शार्वा और छोटी का अद्रिजा शार्वा है। ये बच्चे CARA के द्वारा प्रदत्त है । अतः उनकी कोई भी पुरानी जानकारी कभी भी किसी को भी नहीं दी जाएगी। यहां तक मुझे भी नहीं दी गई है। और यह भविष्य में अपनी मां के रूप में मुझे ही पाएंगे और मेरा जो कुछ भी है या मेरा पारिवारिक जो भी चीज हस्तांतरण हो सकती है वह सभी मेरी बेटियों को दिया जाएगा,चाहे मेरी नौकरी हो ,पेंशन हो,या संपत्ति। बच्चे अब 3 साल के होने वाले है और उन्हें आउटडोर गेम पसंद है। वाद्य यंत्रों में भी उनकी रूचि है। भविष्य में वे विद्यालयीन शिक्षा ग्रहण करेंगे। CARA के निरीक्षण अधिकारी समय समय पर आकर बच्चों के लालन पालन का निरीक्षण करते हैं। उनसे प्रभावित होकर 25 जोड़ो ने अभी तक एडॉप्शन के लिए आवेदन किए है, जिनमें से 3 के घर बच्चों को हस्तांतरण किया गया है। सुश्री शार्वा का संदेश है जीवन में कोई भी चीज असंभव नहीं है , चाहिए तो इमानदार सोच के साथ, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति फिर ऊपरवाला स्वयं उस कार्य को सिद्ध कर देता है।

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