श्री कृष्ण जन्म और सुदामा से मित्रता की कथा सुन भाव विभोर हुए श्रद्धालु, कमरौद में हुआ नवरात्र पर चल रहा भागवत का समापन



संतोष साहू, बालोद। बालोद जिले के ग्राम कमरौद में हनुमान मंदिर परिसर में इस नवरात्रि के अवसर पर सात दिवसीय भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आयोजन किया गया था। जिसमें मुख्य कथा वाचक पंडित लोकेश शर्मा रहे। इस कथा प्रसंग के दौरान श्री कृष्ण जन्म लीला के साथ ही सुदामा और कृष्ण की मित्रता पर झांकी के साथ भगवान की महिमा बताई गई। जिसे सुनकर लोग भाव विभोर हो गए। गुंडरदेही ब्लॉक के ग्राम कमरौद में चल रही सात दिवसीय श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह कथा के दौरान कृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। व्यास पीठ से कथा वाचक पंडित लोकेश शर्मा ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा विस्तार से सुनाई। जैसे ही कथा में कृष्ण जन्म का प्रसंग आया, पंडाल में भगवान श्रीकृष्ण और वासुदेव के मथुरा से गोकुल पहुंचने का अभिनय हुआ। मंच की ओर बढ़ते ही पूरा पंडाल जयकारों से गूंज उठा। मुख्य यजमान और सह यजमानों ने भगवान श्रीकृष्ण और वासुदेव की अगुवानी की। उन्हें कथा मंच तक ले जाया गया। कथा वाचक ने जब नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की भजन गाया, तो श्रद्धालु झूम उठे। महिलाएं, पुरुष और बच्चे भक्ति में लीन होकर नाचने लगे। पूरा पंडाल गोकुल जैसा नजर आने लगा। इस अवसर पर कृष्ण जन्म की बधाइयां दी गईं। कथा में कहा कि आज व्यक्ति मोह माया के चक्कर में फंसकर अनीति पूर्ण तरीके से पैसा कमाने में जुटा है। जिसका परिणाम अंततः उसे भोगना पड़ता है। मानव मानव की तरह नहीं जी रहा है। श्रीमद भागवत जीवन जीने और मरने की कला सिखाती है। कलयुग में दुख के तीन कारण हैं, समय, कर्म और स्वभाव। पंडित लोकेश शर्मा ने बताया कि द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात मथुरा के कारागार में देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यह दिन बुधवार था। उस रात रोहिणी नक्षत्र था। श्रीकृष्ण चंद्रवंशी थे। चंद्रदेव उनके पूर्वज थे। बुध उनके पुत्र माने जाते हैं। इसी कारण उन्होंने बुधवार को जन्म लेने का दिन चुना। भगवान श्रीकृष्ण देवकी की आठवीं संतान थे। उनका जन्म मामा कंस के कारागार में हुआ था। माता देवकी राजा कंस की बहन थीं। उन्होंने ने बताया इसी कारण भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है। वही कृष्ण सुदामा की मित्रता के बारे में जब पंडित लोकेश शर्मा ने बताया तो लोगों की आंखें नम हो गई। उन्होंने कहा कि यदि सुदामा दरिद्र होते तो उनके लिए अन्न की कोई कमी नहीं थी। सुदामा के पास विद्वता थी और धनार्जन तो सुदामा उससे भी कर सकते थे। मगर सुदामा पेट के लिए नहीं बल्कि आत्मा के लिए कर्म कर रहे थे। वे आत्म कल्याण के लिए उद्यत थे । पत्नी के कहने पर सुदामा का द्वारका आगमन और प्रभु द्वारा सुदामा के सत्कार पर लोकेश शर्मा ने कहा कि एक व्यक्ति का नहीं व्यक्तित्व का सत्कार है । यह चित का ही नहीं चरित्र की पूजा है। सुदामा की निष्ठा और सुदामा के त्याग का समान है। मित्रता में बदले की भावना का स्थान नहीं होना चाहिए। भजनों के माध्यम से प्रभु की आरती, करुणा, कृपा वृष्टि की लीलाओं का श्रवण कर सभी श्रोता भावुक हो गए। इस दौरान कृष्ण, रुक्मणी, सुदामा व सुशीला की झांकी के दर्शन करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ी। आयोजन में प्रमुख रूप से मंदिर समिति के अध्यक्ष पुनीत राम देशलहरे, उपाध्यक्ष सुरेंद्र पटेल, कोषाध्यक्ष विशंभर चतुर्वेदी, सचिव ब्रज किशोर साहू, दीनूराम, परमेंद्र कुमार, बलराम साहू, भूषण चतुर्वेदी, कामता साहू, रूपेश साहू, विनोद यदु आदि का योगदान रहा।इस नवरात्र के दौरान मंदिर में कुल 287 जोत जलाए गए थे। नवरात्रि के पूरे 9 दिन आस्था की भीड़ उमड़ी। 30 मार्च से 6 अप्रैल तक श्रीमद् भागवत कथा वाचन पंडित लोकेश शर्मा निवासी नेवारीकला द्वारा किया गया।

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